उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य जिसका राजनीतिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। इस राज्य ने देश को आठ प्रधानमंत्री दिए हैं। लोकसभा सीटों और विधानसभा सीटों के लिहाज से भी देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है। यही वजह है कि देश की राजनीति में इसकी अहम भूमिका है। इस राज्य ने कई उतार-चढ़ाव के दौर भी देखे।
लोकसभा की 543 सीटों में से 80 सीटें और 403 सदस्यीय विधानसभा वाला उत्तर प्रदेश देश का राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। 25 जनवरी, 1950 को जब संयुक्त प्रांत का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश रखा गया, तब से इस राज्य ने 17 विधानसभा चुनावों के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय की है और कई दिग्गज नेताओं, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को दिया।
हालांकि, इसके 21 मुख्यमंत्रियों में से केवल योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव और मायावती ने ही अपना पूरा पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया है, जो इसकी राजनीति की तीव्र अस्थिरता को दर्शाता है। मुख्यमंत्रियों की सूची में ही राज्य के जातिगत समीकरणों की सच्चाई भी छिपी है। इसके 21 मुख्यमंत्रियों में से दस ब्राह्मण या ठाकुर रहे हैं। शेष में तीन यादव, तीन बनिया, एक लोध, एक जाट, एक कायस्थ, एक दलित और एक सिंधी शामिल हैं। यह ऐसी कहानी है जो उत्तर प्रदश के राजनीतिक बदलाव को दर्शाती है।
ऐसे में अगर हम समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह की यादव की बात करें तो वह उस दौर में उभर जब 1970 के दशक के बाद तेज सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर चल रहा था। उस वक्त में उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ने लगा था, जिसके चलते सामान्य वर्ग के नेताओं के प्रभुत्व वाली कांग्रेस पार्टी हाशिए पर चली गई और देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य यूपी में भाजपा राम जन्मभूमि मंदिर के आक्रामक अभियान के चलते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी तीव्र रूप से बढ़ रहा था।
समाजवादी नेता के रूप में उभरने के बाद मुलायम ने जल्द ही खुद को ओबीसी समुदाय के एक मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित कर किया। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस द्वारा खाली किए गए राजनीतिक क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया।
जब भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव
साल 1989 में मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह वही साल था जब यूपी में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी। तब से राज्य में कांग्रेस सत्ता में वापस आने में विफल रही है। यूपी में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री एनडी तिवारी थे। हालांकि, यह भी एक विडंबना है कि एनडी तिवारी के बाद राज्य में किसी भी पार्टी से कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं हुआ और न ही तब से कांग्रेस यूपी की सत्ता में लौटी है।
1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव ने जनता दल के नेता के रूप में बीजेपी के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री पद संभाला।
मुलायम सिंह 1993 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उस समय वह समाजवादी पार्टी के नेता थे और कांशीराम के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी उनकी सहयोगी थी।
2003 में वह तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सत्ता में आए। इस बार वह समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन सरकार के प्रमुख थे। मुख्यमंत्री के रूप में उनके तीनों कार्यकालों को मिलाकर कुल अवधि करीब 6 साल 9 महीने रही।
पहलवान से शिक्षक फिर राजनेता
पहलवान से शिक्षक बने मुलायम का जन्म 22 नवंबर, 1939 को इटावा में हुआ था। उन्होंने राजनीति विज्ञान में एमए और बीएड की डिग्री प्राप्त की थी। वे पहली बार 1967 में संयुक्त समाजवादी पार्टी (एसएसपी) के उम्मीदवार के रूप में इटावा के जसवंतनगर से विधायक चुने गए, लेकिन 1969 में कांग्रेस के बिशंभर सिंह यादव से चुनाव हार गए।
1974 के मध्यावधि चुनावों से पहले मुलायम चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) में शामिल हो गए और उसके टिकट पर जसवंतनगर सीट से चुनाव जीते। उन्होंने 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर फिर से इसी सीट से जीत हासिल की। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में राम नरेश यादव की सरकार में वे सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री थे।
1980 के चुनावों में जब कांग्रेस ने वापसी की तो मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के बलराम सिंह यादव से अपनी सीट हार गए। बाद में वे लोक दल में शामिल हो गए और उसके उम्मीदवार के रूप में राज्य विधान परिषद के लिए चुने गए और विपक्ष के नेता भी बने। 1985 के विधानसभा चुनावों में मुलायम जसवंतनगर से लोक दल के टिकट पर निर्वाचित हुए और विपक्ष के नेता बने।
1989 में उत्तर प्रदेश की 10वीं विधानसभा के चुनाव से कुछ महीने पहले मुलायम सिंह वीपी सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल में शामिल हो गए और उन्हें इसकी उत्तर प्रदेश इकाई का प्रमुख नियुक्त किया गया। विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरने के बाद, उन्होंने राज्यव्यापी क्रांति रथ यात्रा शुरू की।
इस चुनाव में जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसने 421 में से 208 सीटें जीतकर बहुमत से कुछ ही कम सीटें हासिल कीं। भाजपा को 57 सीटें मिलीं, जबकि बसपा ने 13 सीटें जीतीं। मुलायम एक बार फिर जसवंतनगर से जनता दल के टिकट पर निर्वाचित हुए। उन्होंने 5 दिसंबर 1989 को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
नवंबर 1990 में जब जनता दल दो गुटों में विभाजित हो गया, जिनका नेतृत्व वीपी सिंह और चंद्रशेखर कर रहे थे, तब कांग्रेस ने केंद्र में चंद्रशेखर सरकार और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार का समर्थन किया। बाद में कांग्रेस ने दोनों सरकारों से नाता तोड़ लिया, जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में नए चुनाव हुए।
समाजवादी जनता पार्टी (एसजेपी) ने कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बचाने की कोशिश की। उनकी सरकार गिरने के बाद, एसजेपी ने 1991 के उत्तर प्रदेश चुनावों में 399 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 34 सीटें ही जीत सकी। हालांकि, मुलायम जसवंतनगर और दोनों सीटों से निर्वाचित हुए।
कुछ महीनों बाद, 1992 में मुलायम ने अपनी खुद की पार्टी ‘सपा’ की स्थापना की, जो तब से उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख दल बन गई है।
मुलायम ने 1993 के चुनावों के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जिसमें सपा ने भाजपा की 176 सीटों के मुकाबले 108 सीटें जीती थीं।
बसपा के 68वें उम्मीदवार ने शिकोहाबाद, जसवंतनगर और निधौलीकलां से चुनाव लड़ा और तीनों सीटों से जीत हासिल की। भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सरकार बनाने का दावा पेश किया, जबकि मुलायम ने दावा किया कि उन्हें गैर-भाजपा पार्टियों के सभी सदस्यों और कुछ निर्दलीय सदस्यों का समर्थन प्राप्त है।
मुलायम के नेतृत्व में 27 सदस्यीय सपा-बसपा गठबंधन सरकार ने 4 दिसंबर, 1993 को कार्यभार संभाला। 29 जनवरी, 1995 को कांग्रेस ने इस सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। 1 जून, 1995 को बसपा ने भी सरकार से नाता तोड़ लिया। राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मुलायम से इस्तीफा देने को कहा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। 3 जून, 1995 को वोरा ने मुलायम सरकार को बर्खास्त कर दिया।
