Lok Sabha Election 2024: उत्तर प्रदेश तय करेगा दिग्गजों का सियासी कद, PM मोदी, राहुल और अखिलेश, किसका कितना असर? – Jansatta

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क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू 18वीं लोकसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर चलेगा? क्या राहुल गांधी कभी कांग्रेस के गढ़ रहे इस प्रदेश में इकाई पर पहुंच गई पार्टी की सीट में इजाफा कर पाने में कामयाब हो पाएंगे? क्या अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी की सीटों की संख्या को दहाई तक पहुंचा पाने में कामयाब होंगे? और क्या मायावती बहुजन समाज पार्टी अपनी सीटों की संख्या में दहाई से अधिक इजाफा कर पाएंगी? इन सब सवालों का जवाब उत्तर प्रदेश की जनता को देना है। इसी जवाब से इन राजनेताओं का सियासी कद राष्ट्रीय स्तर पर तय होगा।
बात 2014 की है। 16वीं लोकसभा के चुनाव में जब नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया था तो उस वक्त यह कहा गया था कि उनके वाराणसी से चुनाव लड़ने का असर उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर पड़ेगा। ऐसा हुआ भी। 16वीं लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीतीं और अपने सहयोगी दलों के साथ प्रदेश की 75 सीटों पर जीत का परचम लहराया।
2019 में 17वीं लोकसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री के वाराणसी से दूसरी बार चुनाव लड़ने पर भाजपा को प्रदेश की 80 में से 61 सीटों पर विजय मिली। इस बार, यानी 18वीं लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी तीसरी बार वाराणसी से चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस बार उनके 80 में 80 के नारे को उत्तर प्रदेश की जनता किस अंदाज में लेती है? और भाजपा को उत्तर प्रदेश की 80 में से कितनी लोकसभा सीटों पर विजय का स्वाद चखने को मिलता है।
कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी क्या संजीवनी दे पाएंगे? संजीवनी इस लिए क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश मे अमेठी और रायबरेली सीट पर जीत हासिल हुई थी। अमेठी से राहुल गांधी ने स्मृति ईरानी को एक लाख मतों से अधिक के अंतर से पराजित किया था। जबकि रायबरेली से से सोनिया गांधी जीत का संसद पहुंची थीं। 2019 के चुनाव में राहुल गांधी को अमेठी से हाथ धोना पड़ा था। बस रायबरेली सीट सोनिया गांधी ने जीत कर पार्टी की साख उत्तर प्रदेश में जाने से बचा ली थी।
इस बार के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव मैदान में हैं। यदि भौगोलिक आधार पर देखा जाए तो रायबरेली को उत्तर प्रदेश का केंद्र माना जा सकता है क्योंकि यह सीट उत्तर प्रदेश के मध्य में आती है। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि रायबरेली से चुनाव मैदान में उत्तर कर राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में क्या कमाल दिखा पाते हैं?
उधर, अखिलेश यादव कन्नैज से चुनाव मैदान में हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में वे प्रदेश में अपने पांच सांसदों से अधिक जीता कर संसद तक नहीं पहुंचा पाए थे। इस बार उनके समक्ष सपा को उत्तर प्रदेश में बड़ी जीत की तरफ ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अखिलेश यादव किसी चमत्कार की आस लगाए सियासी मैदान में हैं। जबकि बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती 2014 के लोकसभा चुनाव में खाता न खोल पाने के बाद भी 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर दस सांसदों को जीत की दहलीज तक पहुंचा पाने में कामयाब हुई थीं। 18वीं लोकसभा का चुनाव वे अकेले लड़ रही हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस बार वो अपने दहाई के आंकड़े को बचा पाने में कामयाब होती हैं। या इस संख्या में इजाफा होता है।

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