Lok Sabha Election 2024: ‘इंडिया शाइनिंग’ में भाजपा हारी क्यों? फेरा जो न था… पार्टी ने बदल लिया फ.. – दैनिक जागरण (Dainik Jagran)

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Lok Sabha Election 2024 चुनावी पंडितों के लिए लाख टके का सवाल रहा कि ‘इंडिया शाइनिंग’ के शोर के बीच साल 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी हारी क्यों? भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण था- प्रत्याशियों को फेरा (बदला) न था। तब भाजपा झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में 13 पर हारी तो अब क्‍या अब फॉर्मूला बदल दिया।
मृत्युंजय पाठक, रांची। कभी अकबर ने अपने मुंहलगे दरबारी बीरबल से पूछा था-रोटी जली क्यों? पान सड़ा क्यों? घोड़ा अड़ा क्यों? बीरबल ने तपाक से जवाब दिया था- जहांपनाह, फेरा न था। यह तो मुगलकाल की बातें रही। चुनावी पंडितों के लिए लाख टके का सवाल रहा कि ‘इंडिया शाइनिंग’ के शोर के बीच साल 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी हारी क्यों? भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण था- प्रत्याशियों को फेरा (बदला) न था।

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दरअसल, अयोध्या आंदोलन के बाद भाजपा का उत्थान हुआ। राम लहर पर सवार होकर 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सांसदों की संख्या दो से बढ़कर 89 हो गई। इसके बाद भाजपा के सांसद 1991, 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में लगातार जीतते रहे। लगातार सांसद बन रहे भाजपा के नेता अपने को संगठन से ऊपर समझने लगे। कार्यकर्ताओं को पूछते नहीं थे।

जनता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी के बावजूद भाजपा ने प्रत्याशियों को नहीं बदला। कार्यकर्ता घर में बैठ गए। कार्यकर्ता मानकर चल रहे थे कि चुनाव में भाजपा की वापसी हो रही है। एक सीट हार जाने से क्या फर्क पड़ता है? और झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में 13 पर भाजपा हार गई। इनमें 11 सीटिंग सांसद थे, जिनमें से ज्यादातर लगातार चुनाव जीत रहे थे। एक मात्र कोडरमा में भाजपा प्रत्याशी बाबूलाल मरांडी की जीत हुई।
बाबूलाल कोडरमा से पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े थे। वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस को 145 सीटें मिलीं थीं, जबकि भाजपा के खाते में 138 सीटें आई। कांग्रेस ने बसपा, सपा और लेफ्ट फ्रंट के सहयोग से सरकार बनाई और मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बने। अगर झारखंड और बिहार में भाजपा की करारी हार नहीं हुई होती तो राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता।
कांग्रेस और भाजपा के बीच मात्र सात सीटों का अंतर था। अविभाजित बिहार के जमाने में 1999 के चुनाव में भाजपा ने 54 में 23 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं, 2004 के चुनाव में बिहार-झारखंड में भाजपा को मात्र छह सीटें मिली थीं।

2004 में यूपीए ने किया था चुनाव में शानदार प्रदर्शन

लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस ने वाम और क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) बनाया था। झारखंड में कांग्रेस, झामुमो, राजद, लोजपा और सीपीआई शामिल थे। राज्य की 14 सीटों में कांग्रेस को सिंहभूम, गोड्डा, लोहरदगा, खूंटी, धनबाद और रांची में तथा झामुमो को राजमहल, दुमका, गिरिडीह और जमशदेपुर, राजद को दो-पलामू और चतरा में व सीपीआइ को हजारीबाग में जीत मिली थी। भाजपा के खाते में कोडरमा सीट आई, जहां बाबूलाल मरांडी जीते। कांग्रेस और झामुमो में भी यहां दोस्ताना संघर्ष हुआ था।

चुनाव में छा गया पलामू

साल 2004 के लोकसभा चुनाव में मूल रूप से पलामू के रहने वाले चार नेता सांसद बने थे। पलामू लोकसभा क्षेत्र से राजद के मनोज कुमार जीते थे। इसके अलावा पलामू के रहने वाले सुबोध कांत सहाय रांची, चंद्रशेखर दुबे धनबाद और रामेश्वर उरांव लोहरदगा से लोकसभा चुनाव जीते थे।
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झारखंड के बदले नहीं मिले वोट

राजनीति का यह सत्य है कि सिर्फ काम से चुनाव नहीं जीता जा सकता है। यह 2004 के चुनाव में साबित हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 15 नवंब 2000 को अलग झारखंड राज्य का निर्माण किया। भाजपा को उम्मीद थी कि अलग झारखंड राज्य बनाने बदले उसे वोट मिलेगा। ऐसा नहीं हुआ। राज्य की 14 में 13 सीटों पर भाजपा हार गई। यह भाजपा के लिए सदमा था।
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