मुंगेर में अगड़ा Vs पिछड़ा करने में सफल रहे लालू: ललन-नीतीश से नाराजगी के बीच जातीय किलेबंदी की लड़ाई; नए स… – Dainik Bhaskar

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फील गुड में नहीं रहिएगा। खास कर 13 मई (चुनाव) तक तो एकदम नहीं। फील गुड के कारण अटल जी की सरकार चली गई थी।
मुंगेर में एनडीए प्रत्याशी ललन सिंह जहां भी जा रहे हैं इस बात की ताकीद जरूर कर रहे हैं। उनके इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। लालू प्रसाद यादव ने जब बिना मुहूर्त के अशोक महतो की चट शादी करा उनकी पत्नी को पट मुंगेर का टिकट दे दिया था, तब इस बात की चर्चा तेज थी कि लालू ने ललन सिंह के खिलाफ कमजोर कैंडिडेट दिया है।
चुनाव आते-आते अब पटना, लखीसराय और मुंगेर जैसे सवर्ण बहुल तीन जिलों में फैले मुंगेर लोकसभा क्षेत्र में लड़ाई पूरी तरह अगड़ा-वर्सेज पिछड़ा पर आ टिकी है। लोग यह कहते हुए आसानी से मिल जाते हैं कि जंग वही जीत पाएगा जो अपनी जातियों की किलेबंदी करने में सफल रहेगा।
क्या लालू यादव मुंगेर में अगड़ा वर्सेज पिछड़ा कराने की अपनी मंसा में सफल रहे ? क्या अशोक महतो ने ललन सिंह की मुसीबत बढ़ा दी है? क्या नीतीश कुमार और ललन सिंह से नाराज भूमिहार चुनाव में ललन सिंह का साथ दे रहे हैं? क्या अनंत सिंह अपनी पुरानी अदावत भूलकर ललन सिंह को विजयी बनाने के लिए मैदान में हैं, क्या अनंत सिंह का लाभ ललन सिंह को मिल रहा है? पढ़िए दैनिक भास्कर के इस ग्राउंड रिपोर्ट में…
सबसे पहले समझिए ललन सिंह की चुनौती
भूमिहारों में नीतीश कुमार और ललन सिंह के प्रति नाराजगी
ललन सिंह की सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही बिरादरी भूमिहारों की नाराजगी दूर करने की है। उनके व्यवहार के कारण भूमिहारों का एक बड़ा वर्ग उनसे नाराज है। उनका आरोप है कि अपनी जाति से अपना सांसद होने के बाद भी वे उन तक आसानी से अपनी समस्या तक नहीं पहुंचा पाते हैं। इलाके की कई समस्याएं है जिनका समाधान नहीं हो पाया है। मोकामा में जहां टाल तो बड़हिया में ट्रेनों के ठहराव को लेकर लोग नाराजगी दर्ज कराते हुए मिल जाते हैं।
बाढ़ में हमारी मुलाकात पंकज सिंह से हुई। वे दो टूक में कहते हैं कि ललन सिंह मजबूरी हैं, मोदी जी जरूरी हैं।
ललन सिंह को लेकर भूमिहारों के एक बड़े वर्ग में इस बात की नारजगी है कि वे किसी की सुनते नहीं हैं। भूमिहारों में ललन सिंह से ज्यादा नाराजगी उनकी पार्टी के मुखिया और बिहार के सीएम नीतीश कुमार को लेकर है। बड़ी संख्या में लोग उनका नाम सुनते ही भड़क उठते हैं। ये नाराजगी केवल भूमिहारों तक ही सीमित नहीं है। इलाके का एक बड़ा अतिपिछड़ा वर्ग भी नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने से नाराज है।
अनंत सिंह ने डैमेज कंट्रोल कर दूर की भूमिहारों की नाराजगी
बीच चुनाव में जब अनंत सिंह को कोर्ट से 15 दिन की पैरोल मिली तो इस बात की चर्चा शुरू हो गई कि मुंगेर की लड़ाई को बाहुबली वर्सेज बाहुबली कराने की कोशिश की गई है, लेकिन यहां कहानी थोड़ी-सी अलग है। नीतीश कुमार से भूमिहारों की नाराजगी की शुरुआत 5 साल पहले अनंत सिंह को जेल भेजने से ही हुई थी। इसमें ललन सिंह की भी एक बड़ी भूमिका सामने आई थी।
अब तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अनंत सिंह सारे शिकवे-गिले भूला कर एक बार फिर से ललन सिंह के साथ है। पहले उपचुनाव में अनंत सिंह की पत्नी को जिताने के लिए ललन सिंह ने मशक्कत की, अब ललन सिंह को जिताने के लिए अनंत सिंह ताकत झोंक रहे हैं। अनंत सिंह के इलाके में घूमने के बाद ललन सिंह को सबसे बड़ा लाभ ये मिल रहा है कि मोकामा के जो भूमिहार कशमकश थे, अब वे पूरी तरह ललन सिंह के साथ एक जुट हो गए हैं।
मोकामा में लगभग हर कोई ये बात कहते हुए मिल जाते हैं कि विधायक अनंत सिंह के कारण भूमिहारों में फिलहाल ललन सिंह को लेकर नाराजगी नहीं है। अनंत सिंह नहीं होते तो भूमिहारों को दूसरा विकल्प ढूंढना पड़ता। अनंत सिंह के आने से ललन सिंह को फायदा हुआ है।
अशोक महतो के कारण ललन सिंह के साथ लामबंद हो रहे भूमिहार
बड़हिया के रामचंद्र सिंह कहते हैं कि लखीसराय से भूमिहार ललन सिंह सांसद हैं, मंत्री गिरिराज सिंह का घर है, डिप्टी सीएम विजय सिन्हा यहां के विधायक हैं। इसके बाद भी कोरोना के दौरान बड़हिया की लाइफ लाइन कही जाने वाली जिन चार ट्रेनों का ठहराव यहां से बंद किया गया था वो आज तक बहाल नहीं हो पाया है।
इसी ट्रेन से किसान, व्यापारी व्यापार करते थे। आज सब ठप है इसके बाद भी ये बाभनवाद के नाम पर वोट मांगते हैं। इससे ज्यादा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।लेकिन अभी एक नीम है तो एक करैला है। ऐसे में किसी एक को खाना है तो अपना करैला ही सही है।
अब समझिए लालू का दांव कितना सफल रहा
लालू मुंगेर में अगड़ा वर्सेज पिछड़ा कराने में कामयाब रहे
2008 की परिसीमन के बाद मुंगेर में अब तक तीन चुनाव हुए हैं। यहां तीनों बार भूमिहार ही जीतने में सफल रहे हैं। इसमें दो बार खुद ललन सिंह जीते हैं। एक बार बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी जीती हैं। इसके बावजूद लालू प्रसाद यादव ने यहां से अशोक महतो की पत्नी कुमारी अनीता को उम्मीदवार बनाया। लालू की कोशिश मुंगेर में सवर्ण के खिलाफ पिछड़ा को अपने साथ जोड़ना था और वे इसमें काफी हद तक सफल होते हुए भी दिखाई दे रहे हैं।
मुंगेर में यादव और मुस्लिम जहां पूरी तरह लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव के साथ लामबंद हैं। अशोक महतो को उम्मीदवार बनाने के बाद ओबीसी का एक बड़ा वर्ग जो अभी तक नीतीश कुमार का कोर वोट बैंक माना जाता था, वो अब लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ता हुआ दिख रहा है। अशोक महतो की पत्नी जो खुद धानुक जाति से आती हैं, उनके कारण धानुक और कुर्मी में एक बड़ी सेंधमारी होती हुई दिखाई दे रही है।
कुर्मी की नाराजगी, टिकट बांटने में नीतीश गलती किए हैं
अशोक महतो कुर्मी में अपनी पैठ बनाने में कितना कामयाब रहे हैं, इसकी पड़ताल करने के लिए हम कुर्मी बाहुल इलाके मानिकपुर, कवातपुर और मेदनी चौकी के इलाके में पहुंचे। कवातपुर गांव में हमारी मुलाकात भागवत सिंह से हुई। वे कहते हैं कि यहां पहली बार यहां लालटेन छाप का बोलबाला है।
वहीं 65 वर्षीय लक्ष्मी नारायण सिंह कहते हैं कि ये वही नीतीश कुमार हैं, जो नरेंद्र मोदी के विरोध में देश के सारे विरोधी पार्टी को एक साथ मंच पर लाए. फिर उन्हीं के साथ मिल गए। कुर्मियों में इसी बात पर नाराजगी है। इसके बाद आरजेडी की तरफ से जिसे कैंडिडेट बनाया गया है वो हर लिहाज से सही है। इस इलाके में कुर्मी समाज के बड़ी संख्या में लोग इस तरह की बात करते हुए मिल जाते हैं।
अशोक महतो के सामने सबसे बड़ी चुनौती आइडेंटिटी क्राइसिस की
अशोक महतो 17 साल जेल में गुजारने के बाद बाहर आए हैं। वे मूल रूप से नवादा के रहने वाले हैं। शेखपुरा का कुछ इलाका उनका गढ़ रहा है। अचानक पहले सुर्यगढ़ा में शादी और इसके बाद मुंगेर से लोकसभा चुनाव का टिकट। यहां की बड़ी आबादी अभी भी ऐसी है जो उनकी पत्नी अनीता देवी और अशोक महतो की पहचान से अंजान है। जो जानते हैं, उनके सामने अशोक महतो की छवि कुख्यात की है। इसका बड़ा नुकसान अशोक महतो को होता हुआ दिखाई दे रहा है।
आलोक तिवारी 40 साल से मुंगेर बाजार में अपनी दुकान चला रहे हैं। वे कहते हैं कि बाजार से तो ललन सिंह ही लीड करेंगे। उनके खिलाफ नाराजगी जरूर है लेकिन उनके सामने जो हैं उन्हें तो हम पहचानते तक ही नहीं हैं। पहली बार दोनों का नाम सुना हूं। वे बस लालू यादव के नाम पर यहां चुनाव लड़ रहे हैं।
यादव, मुस्लिम के साथ धानक-कुर्मी का समीकरण तैयार कर रहे लालू
मुंगेर के वरिष्ठ पत्रकार राजेश कुमार कहते हैं कि यहां नेक टू नेक फाइट होने वाली है। जीत किस की भी हो मार्जिन बहुत कम होगी। यहां लालू यादव ने प्रयोग किया है और उनका ये प्रयोग विधानसभा में सफल हो सकता है। राजेश कुमार कहते हैं कि नीतीश कुमार अभी तक कुर्मी, कोयरी और धानुक के सर्वमान्य नेता माने जाते हैं।
मुंगेर का जातीय समीकरण समझिए, सवर्ण के बाद कुर्मी की सबसे ज्यादा आबादी
मुंगेर लोकसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण को देखें तो यहां सबसे ज्यादा 4 लाख वोटर्स भूमिहार हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर धानुक (कुर्मी) और कुशवाहा हैं। मुंगेर में इनकी संख्या लगभग 2 लाख है। वहीं लगभग 1.5 लाख यादव और 90 हजार मुस्लिम आबादी है। वहीं लगभग डेढ़ लाख बनिया वोटर्स इस लोकसभा क्षेत्र में हैं।
अब मुंगेर लोकसभा को जानिए
मुंगेर का राजनीतिक इतिहास देखें तो वर्ष 1952, 1957, 1962, 1971 के संसदीय चुनावों में कांग्रेस ने परचम लहराया। लेकिन 1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस के जीत के सिलसिले को रोक दिया। 1980 और 1984 में फिर से कांग्रेस जीती।1989 के में यहां जनता दल की जीत हुई।1991 में सीपीआई से ब्रह्मानंद मंडल सांसद बने।1996 में फिर से ब्रह्मानंद मंडल जीते, लेकिन समता पार्टी से।
1998 में एक साल के लिए आरजेडी से विजय कुमार विजय सांसद बने। 2004 में आरजेडी के जयप्रकाश नारायण यादव जीते। 2009 में जेडीयू के ललन सिंह सांसद हुए। 2014 में सूरजभान सिंह की पत्नी एलजेपी से वीणा देवी जीतीं। 2019 में महागठबंधन की कांग्रेस उम्मीदवार और अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को जेडीयू के ललन सिंह ने हराया और सांसद बने। बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी की जीत की बड़ी वजह नरेन्द्र मोदी लहर थी।

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