UP Lok Sabha Election 2024 कांशीराम बसपा से चुनाव लड़े और एक लाख 45 हजार वोट पाकर जीत गए। दूसरे नंबर पर भाजपा के लालसिंह वर्मा रहे। जबकि तीसरे नंबर पर सजपा के रामसिंह शाक्य को 81 हजार के करीब वोट मिले। यहीं से मुलायम व कांशीराम एक दूसरे के नजदीक आए और कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव को नई पार्टी बनाने की सलाह दी।
गौरव डुडेजा, इटावा। UP Lok Sabha Election 2024 आजादी के बाद से 72 साल के इतिहास में इटावा की राजनीति ने कई रंग देखे। समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव का गृह जनपद होने के कारण जहां उनका प्रभाव रहा वहीं एक समय ऐसा भी आया जब मुलायम सिंह ने बसपा के संस्थापक कांशीराम को जिताने के लिए अपने ही प्रत्याशी को चुनाव हरवा दिया।
मुलायम सिंह की पार्टी सजपा यानी समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार राम सिंह शाक्य चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव से तीन दिन पहले मुलायम कांशीराम का गठबंधन हो गया। मुलायम सिंह ने कांशीराम को लोकसभा में भेजने के लिए उनके समर्थन में अपील जारी कर दी।
कांशीराम के चुनाव एजेंट खादिम अब्बास का कहना है कि कांशीराम बसपा से चुनाव लड़े और एक लाख 45 हजार वोट पाकर जीत गए। दूसरे नंबर पर भाजपा के लाल सिंह वर्मा रहे। जबकि तीसरे नंबर पर सजपा के राम सिंह शाक्य को 81 हजार के करीब वोट मिले।
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यहीं से मुलायम व कांशीराम एक दूसरे के नजदीक आए और कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव को नई पार्टी बनाने की सलाह दी। 1992 में नई पार्टी समाजवादी पार्टी का गठन कर मुलायम सिंह यादव ने 1993 में प्रदेश में सरकार बनाई थी।
जब कांग्रेस की बोलती थी तूती तब कमांडर चुने गए निर्दलीय
इटावा लोकसभा सीट पर स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1952 से अभी तक 17 चुनाव हुए हैं। समाजवादी विचारधारा का गढ़ रही इस सीट पर चार बार विजय पताका फहराने वाली कांग्रेस साढ़े तीन दशक से वनवास भाेग रही है। इधर लगातार दो चुनावों में मोदी लहर के प्रभाव से भाजपा का भगवा लहरा रहा है।
भले ही व्यक्तिगत तौर पर कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया और राम सिंह शाक्य के सिर पर तीन-तीन बार विजय का सेहरा सजा लेकिन पार्टी के तौर सिर्फ सपा को हैट्रिक लगाने को सौभाग्य हासिल हुआ है। इस सीट की सबसे रोचक बात यह है कि जब देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी तो 1957 के चुनाव में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया निर्दलीय चुने गए थे।
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जनपद से अब तक निर्वाचित सांसद
1952 – बाल कृष्ण शर्मा (कांग्रेस)
1957 – अर्जुन सिंह भदौरिया (निर्दलीय)
1962 – गोपीनाथ दीक्षित (कांग्रेस)
1967 – अर्जुन सिंह भदौरिया (सोशलिस्ट पार्टी)
1971 – श्रीशंकर तिवारी (कांग्रेस)
1977 – अर्जुन सिंह भदौरिया (भारतीय लोकदल)
1980 – राम सिंह शाक्य (जनता पार्टी एस)
1984 – चौ. रघुराज सिंह (कांग्रेस)
1989 – राम सिंह शाक्य (जनता दल)
1991 – कांशीराम (बसपा)
1996 – राम सिंह शाक्य (सपा)
1998 – सुखदा मिश्रा (भाजपा)
1999 – रघुराज सिंह शाक्य (सपा)
2004 – रघुराज सिंह शाक्य (सपा)
2009 – प्रेमदास कठेरिया (सपा)
2014 – अशोक दोहरे (भाजपा)
2019 – प्रो. रामशंकर कठेरिया (भाजपा)

