अयोध्या। राम मंदिर के दानपात्रों से चढ़ावे की राशि में हुए करोड़ों रुपये के कथित गबन की जाँच अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुँच गई है। जाँच का फोकस अब केवल संदिग्ध कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि चढ़ावे की गिनती और कर्मचारियों की तैनाती की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे मामले में बैंक, आउटसोर्सिंग कंपनी और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, तीनों की भूमिका अब जाँच के घेरे में आ गई है।
बैंक ने दिया ठेका, लेकिन कर्मचारी ट्रस्ट ने किए तय
जाँच में अब तक का सबसे बड़ा खुलासा यह सामने आया है कि चढ़ावे की गिनती के संवेदनशील कार्य के लिए बैंक ने एक आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से कर्मचारियों को रखा था, लेकिन इन कर्मचारियों का चयन और तय स्वयं ट्रस्ट की ओर से किया गया था। दूसरे शब्दों में, जिन लोगों को करोड़ों रुपये के नकद चढ़ावे की गिनती जैसे अत्यंत संवेदनशील कार्य में लगाया गया, वे या तो किसी प्रभावशाली पदाधिकारी के परिचित बताए जा रहे हैं या फिर उनसे जुड़ा कोई सुनियोजित नेटवर्क रखते थे।
न सत्यापन, न तलाशी, न प्रभावी निगरानी
सबसे गंभीर प्रश्न इस व्यवस्थागत लापरवाही पर उठ रहे हैं कि चढ़ावा गिनने वाले इन कर्मचारियों का न तो कभी उचित पुलिस सत्यापन कराया गया, न ही उनकी कोई नियमित तलाशी ली गई और न ही उन पर कोई प्रभावी निगरानी तंत्र लागू किया गया। स्थिति यह थी कि ट्रस्ट का कर्मचारी पहचान पत्र लगाकर ये लोग मंदिर परिसर में बिना किसी रोक-टोक के आसानी से आवाजाही करते थे। मंदिर की सुरक्षा में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद, ट्रस्ट कर्मियों की गतिविधियों पर वैसी कड़ी निगरानी कभी नहीं दिखी, जैसी अन्य संवेदनशील स्थलों पर अपेक्षित होती है।
12-18 हजार वेतन, फिर भी करोड़ों की संपत्ति
रिपोर्ट के अनुसार, जिन संदिग्ध कर्मचारियों के पास से नकद राशि और संपत्ति के दस्तावेज बरामद हुए हैं, वे महज 12 से 18 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर कार्यरत थे, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ये सभी दिन-रात मंदिर परिसर में ही रहते थे। अब जाँचकर्ता इस पेचीदा सवाल को समझने का प्रयास कर रहे हैं कि इतने कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पास अचानक बड़ी नकदी, अचल संपत्ति और अन्य निवेश कैसे पहुँचे।
बेहिसाब रकम ने बढ़ाई जाँच की मुश्किल
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल चढ़ावे के वास्तविक हिसाब-किताब को लेकर है। जानकारी के अनुसार, मंदिर के दानपात्रों में आने वाली नकद राशि शुरू से ही बेहिसाब होती थी। आशंका जताई जा रही है कि गिनती के दौरान ही असली खेल होता था और जो राशि आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हुई, वह पूरी तरह हिसाब से बाहर रह गई। यही कारण है कि गबन की वास्तविक राशि कितने करोड़ रुपये है, इसका सटीक पता लगाना जाँच एजेंसियों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
