उस रात ईरान की राजधानी तेहरान की फ़िज़ा में भारी बेचैनी थी. कुछ बड़ा होने वाला था.
आधी रात को सैनिकों से भरा एक ट्रक प्रधानमंत्री को गिरफ़्तार करने के लिए रवाना हुआ, लेकिन पहले से ख़बर मिल जाने की वजह से प्रधानमंत्री के वफ़ादार अधिकारियों ने उन सैनिकों को गिरफ़्तार कर लिया.
हालाँकि ऐसा ज़्यादा दिनों तक नहीं रहने वाला था. तख़्तापलट की इस साज़िश की जड़ें बहुत गहरी थीं.
यह ईरान के हालिया विरोध प्रदर्शनों की नहीं बल्कि 15 अगस्त 1953 की रात की बात है, जब ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक़ को हटाने के लिए एक ऐसी साज़िश रची गई, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन समेत ख़ुद ईरान के शाह भी शामिल थे.
मोहम्मद मुसद्दिक़ चार दिन बाद ही इस साज़िश के शिकार हुए और उनकी सरकार का तख़्ता पलट दिया गया.
हाल के प्रदर्शनों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने एक बार फिर इस कार्रवाई की याद ताज़ा कर दी है.
ईरान की तरफ़ से भी अमेरिका को चेतावनी दी गई है कि वह देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से दूर रहे.
