ईरान-इराक हो या फिर रूस… भारत ने जब भी किसी देश से खरीदा तेल, अमेरिका ने अड़ाई टांग!

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अमेरिका ने हाल ही में संकेत दिया कि अगर भारत ने नवंबर तक रूस से सस्ता तेल लेना बंद नहीं किया तो वह भारत पर टैरिफ बढ़ सकता है. इस बार ट्रंप का साफ इशारा था कि भारत अगर उसकी बात नहीं मानेगा तो टैरिफ और ऊपर चला जाएगा. भारत ने पिछले महीनों में अमेरिका से भी तेल लेना बढ़ा दिया है, लेकिन अमेरिकी हर बार की तरह इस बार भी भारत पर दबाव बनाने से पीछे नहीं हट रहे.

कच्चे तेल को लेकर कब-कब भारत पर दबाव बनाया गया 

भारत की विदेश नीति को देखें तो दशकों से एक बात साफ है कि भारत जब-जब अपने फायदे के लिए तेल खरीदने का फैसला करता है अमेरिका सामने आ जाता है. आजादी के बाद से भारत ने कई देशों से पेट्रोलियम क्रूड खरीदा, लेकिन जब-जब भारत ने अमेरिका के दायरे से बाहर जाकर विकल्प चुने तब-तब सवाल, दबाव और चेतावनियां बढ़ीं.

आजादी के बाद 1947–1970 का दौर

ये आजादी के बाद का दौर था जब भारत की जरूरत कम थी और वैश्विक राजनीति शांत थी. आजादी के शुरुआती सालों में भारत की तेल जरूरतें बहुत ज्यादा नहीं थीं. देश खेती पर आधारित था और फैक्ट्रियां भी सीमित थीं. उस समय भारत ने अधिकतर तेल ईरान, इराक और सऊदी अरब से खरीदा. ये सभी देश पश्चिमी देशों के करीबी माने जाते थे इसलिए अमेरिका को भारत की तेल खरीद से कोई परेशानी नहीं थी.

आजादी के दो दशक बाद दुनियाभर में तेल संकट 

1970 के दशक में आए वैश्विक तेल संकट ने यह साफ कर दिया कि तेल सिर्फ ईंधन नहीं ताकत भी है. भारत राजनीतिक रूप से गुटनिरपेक्ष रहा, लेकिन तेल के मामले में वही पुराने देश विकल्प बने रहे. दूसरी तरफ अमेरिका इस स्थिति से सहज था क्योंकि तेल उन्हीं देशों से आ रहा था जो उसके प्रभाव में थे.

1990 में भारत की अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार

1990 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी. देश में फैक्ट्रिया बढ़ीं और तेल की खपत भी बढ़ने लगी तो भारत ने ईरान और इराक के साथ लंबे समय के तेल समझौते करने शुरू किए. इसी दौर में अमेरिका ने इराक पर हमला किया और ईरान पर धीरे-धीरे प्रतिबंध लगाने शुरू किए. इसी समय भारत को पहली बार महसूस हुआ था कि तेल खरीद भी राजनीतिक फैसला बन सकती है.

साल 2000 के बाद तक ईरान भारत के लिए सस्ता और भरोसेमंद तेल देने वाला देश बना. भुगतान की आसान शर्तें थीं और सप्लाई भी लगातार मिलती थी, लेकिन अमेरिका को तब भी यह रिश्ता पसंद नहीं आया. ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के नाम पर प्रतिबंध लगे और भारत से कहा गया कि वह ईरान से तेल खरीदना कम करे. भारत ने उस समय संतुलन बनाया और तेल कम किया, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं किया.

ट्रंप के पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद यूएस का रुख

साल 2016 में डोनाल्ड ट्रंप के पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका का रुख और सख्त हो गया. ईरान से तेल खरीदने पर सीधे प्रतिबंध की धमकी दी गई. मजबूरी में भारत को एक बार फिर अमेरिका की धमकी के कारण ईरान से तेल लगभग बंद करना पड़ा और खाड़ी देशों से तेल लेना बढ़ाना पड़ा. यह फैसला भारत की पसंद नहीं हालात की मजबूरी था.

अब फिर कुछ सालों बाद यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ते दाम पर तेल खरीदना शुरू किया. इससे भारत को आर्थिक फायदा हुआ, लेकिन अमेरिका ने इस पर चिंता जताई. इस बार फर्क यह रहा कि अमेरिका ने कड़ी धमकी नहीं दी, बल्कि सलाह और नाराजगी तक ही बात रखी. वजह साफ थी, लेकिन भारत अब वैश्विक स्तर पर एक मजबूत देश बन चुका है और जानता है तेल सिर्फ ईंधन नहीं राजनीति भी है.

भारत का अनुभव यही बताता है कि तेल खरीद कभी साधारण सौदा नहीं रही. हर दौर में इसमें राजनीति, दबाव और रणनीति जुड़ी रही. फर्क बस इतना है कि पहले भारत दबाव में फैसले बदलता था और आज भारत अपने विकल्पों के दम पर देशहित में फैसले लेते है.

भारत अब अपने फायदे से फैसला करता है

आज भारत के लिए तेल सिर्फ गाड़ियों और फैक्ट्रियों का ईंधन नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है. अमेरिका की आपत्तियों के बावजूद भारत ने यह दिखा दिया है कि वह अब तेल अपनी शर्तों पर खरीदेगा. यही बदली हुई भारत की पहचान है.

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