नईदुनिया प्रतिनिधि, अंबिकापुर। वनों का घटता दायरा,पेड़ों की निरंतर कटाई और खुले आसमान में तब्दील होते घने जंगल ने गजराज को भी विचलित कर दिया है। यही कारण है कि जंगली हाथी जंगलों में विचरण करने के बजाय अब बस्ती की ओर रूख कर दिया है। प्राकृतिक रहवास छोड़ने का प्रतिकूल असर भी दिखाई दे रहा है। प्राकृतिक असंतुलन का खामियाजा हाथी और मानव दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है। यह खामियाजा द्वंद के रूप में सामने आ रहा है। मानव-हाथी के बीच द्वंद के चलते उत्तर से लेकर दक्षिण छत्तीसगढ़ में हाथियों का धमक भी बढ़ते जा रहा है। यह लोकतंत्र के लिए भी चुनौती से कम नहीं है। विधानसभा चुनाव के दौरान जिला प्रशासन ने हाथी प्रभावित क्षेत्र के मतदाताओं के लिए सुरक्षा का इंतजाम किया था। इसका प्रभावी असर दिखाई दिया था। लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी तरह की व्यवस्था की दरकार है।
अविभाजित मध्यप्रदेश के जमाने में अविभाजित बिहार के रास्ते पहली बार 1988 में प्रवासी हाथियों का सरगुजा में प्रवेश हुआ था। इसके बाद हाथियों का कुनबा बढ़ता चला गया। चारा, पानी की पर्याप्त व्यवस्था से ये यहीं के होकर रह गए। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के 36 में से 22 वनमंडल जंगली हाथियों से प्रभावित है। यझारखंड, मध्यप्रदेश,ओडिशा और महाराष्ट्र तक इनका आना – जाना लगा रहता है। उत्तर छत्तीसगढ़ से आगे मध्य छत्तीसगढ़ होते हुए दक्षिण छत्तीसगढ़ तक इनकी धमक बढ़ने लगी है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में प्रदेश में 32 हाथी थे। 2007 में इनकी संख्या 122 और 2017 में 247 थी। वर्तमान समय में लगभग 300 से 350 हाथियों की उपस्थिति छत्तीसगढ़ में है।
जंगल छोड़ एनएच में चहल-कदमी
