वेनेज़ुएला पर भारत के बयान की विदेश नीति के विश्लेषक क्यों कर रहे हैं आलोचना?

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एक नाटकीय घटनाक्रम में अमेरिका के विशेष सैन्य दस्ते ने शनिवार तड़के वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ़्लोरेस को राजधानी काराकास से पकड़ लिया.

उन्हें न्यूयॉर्क ले जाया गया है और वहां ड्रग्स तस्करी के आरोपों में उन पर मुक़दमा चलाया जाएगा. हालांकि मादुरो बार-बार इन आरोपों का खंडन कर चुके हैं और इसे देश में तेल के विशाल भंडार पर क़ब्ज़े का बहाना बताते रहे हैं.

वेनेज़ुएला पर हुई इस कार्रवाई ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. अमेरिका के इस क़दम को दुनिया के कई देशों ने ‘एकतरफ़ा और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई’ बताया.

चीन ने मादुरो को तत्काल रिहा किए जाने की मांग करते हुए कहा था कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन किया है और दक्षिण अमेरिका क्षेत्र में ख़तरा पैदा किया है.

जबकि पाकिस्तान ने कहा कि सभी मुद्दों का समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों के तहत किया जाना चाहिए.

ईसाई धर्मगुरु पोप लिओ ने वेनेज़ुएला की संप्रभुता की गारंटी देने की अपील की.

इस मामले में भारत ने काफ़ी सतर्कता के साथ प्रतिक्रिया दी जिसकी काफ़ी आलोचना हो रही है.

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