Holi 2026: होली पर कैसे शुरू हुई थी रंग-गुलाल लगाने की पंरपरा, जानें हर रंग का महत्व

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होली रंगों का पर्व है। इस त्योहार में लोग भेदभाव, गिले-शिकवे भुलाकर अलग-अलग रंग एक दूसरे को लगाते हैं। कोई पानी संग रंग खेलता है, तो कोई होलिका की राख से। होली में रंग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। होली में लोग लाल, पीला, हरा समेत कई रंगों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर होली पर रंग क्यों लगाया जाता है और रंग लगाने परंपरा कैसे शुरू हुई है। चलिए आज हम होली में रंगों के महत्व और इससे जड़ी कुछ दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं।

शास्त्र मत के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि में होलिका दहन और चैत्र कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा तिथि को होली मनाने की परंपरा है। वैसे यह त्योहार दो दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन होलिका दहन होता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसकी कथा प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका से जुड़ी है। होली में रंग लगाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलिए हैं। एक कथा भगवान श्री कृष्ण और राधा जी से जुड़ी है। मान्तयता है ब्रज क्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण ने सबसे पहले राधा और उनकी सखियों के साथ रंग खेला था।

पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार अपने सांवले रंग को लेकर बचपन कृष्ण चिंतित थे। वो इस बात से चिंतित और परेशान थे की राधा गोरी है, ऐसे में क्या वो उनके सांवले रंग को पसंद करेंगी। इसका समाधान यशोदा मां ने निकाला। उन्होंने कृष्ण से कहा कि तुम राधा के मुंह पर कोई भी रंग लगा दो। इसके बाद कान्हा राधा रानी के पास गए और रंग लगाया। तभी से होली पर गुलाल और रंग लगाने की परंपरा शुरू हुई।

होली के अवसर पर घरों में गुझिया, मालपुआ और दही बड़े जैसे पारंपरिक पकवान बनते हैं। लोग पुराने मतभेद भूलकर गले मिलते हैं और रंग लगाते हैं। कोई हरा रंग लगाता है, तो कोई लाल, पीला, नीला। होली में अलग-अलग रंगों का भी महत्व होता है। क्योंकि ज्योतिष में हर रंग अलग-अलग ग्रहों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। इसलिए लोग अलग-अलग रंग का इस्तेमाल कर ग्रह के बुरे प्रभावों को कम करते हैं।

हालांकि पुराने जमाने में रासायनिक रंग नहीं होते थे, तो होली पूरी तरह प्राकृतिक तरीकों से मनाई जाती थी। लोग पलाश यानी टेसू के फूलों को पानी में भिगोकर केसरिया रंग तैयार करते थे। यह रंग स्कीन के लिए भी सही माना जाता था। साथ ही पीला रंग में हल्दी का इस्तेमाल होता था और चंदन का लेप लगाकर तिलक किया जाता था। लेकिन अब केमिकल रंगों से मार्केट भरा पड़ा है। शास्त्रों के मुताबिक प्राकृतिक रंगों से होली खलने से सकारात्मकता बढ़ती है। चलिए अलग-अलग रंगों के महत्व के बारे में जानते हैं।

लाल रंग- ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक लाल रंग मंगल ग्रह से संबंधित होता है। इस रंग को ऊर्जा और साहस का प्रतीक माना जाता है।

पीला रंग– यह रंग गुरु यानी बृहस्पति ग्रह से संबंधित हैं, जो ज्ञान, ऊर्जा और पवित्रता का प्रतीक हैं। इसके अलावा इस रंग का नाता भगवान विष्णु से भी है। जब आप होली के दिन पीले रंग का इस्तेमाल करते हैं तो आपके घर में सुख-शांति और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।

हरा रंग- यह रंग को बुध ग्रह से संबंधित माना गया है। यह रंग विकास, समृद्धि, संतुलन और शांति का प्रतीक है। होली में इस रंग के इस्तेमाल से रिश्तों में मिठास बढ़ती है।

गुलाबी रंग– गुलाबी रंग शुक्र ग्रह से संबंधित होता है, जो सौंदर्य, प्रेम, कोमलता, शांति का प्रतीक है। अगर आपको रिश्ते में आ रही दूरियों और गलतफहमियों को दूर करना है, तो आपको गुलाबी रंग से होली खेलना चाहिए।

नारंगी रंग- यग रंग सूर्य ग्रह से संबंधित होता है। यह ऊर्जा और रचनात्मकता का प्रतीक है।

नीला रंग– इस रंग का शनि ग्रह से नाता है। इसे मन को शांत करने वाला रंग बताया गया है।

वृंदावन में आज भी फूलों की होली खेली जाती है। इस होली गुलाब, गेंदे और टेसू की पंखुड़ियों से लोग एक-दूसरे पर रंग बरसाते हैं। इसे प्रकृति के करीब माना जाता था। ऐसी मान्यता है कि वसंत ऋतु में वृंदावन के कुंजों में राधा-कृष्ण पुष्पों के बीच क्रीड़ा करते थे। भक्त इसी आनंद का अनुभव करने के लिए फूलों वाली होली मनाते हैं।

डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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