जब चूड़ी बेचने वाले से बुरी तरह हारा वकील, आजादी से 27 साल पहले ही शुरू हो गई थी भारत की चुनावी यात्रा – Jansatta

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1920 के चुनाव भारत में प्रत्यक्ष चुनाव का शुरुआती दौर थे। उससे पहले तक औपनिवेशिक नीति विधायिका के लिए कुछ शिक्षित भारतीयों का चयन करने और जनता की जरूरतों को समझने के लिए उनका उपयोग करने की थी। हालांकि, विधायिकाओं में अधिक भारतीय प्रतिनिधित्व की जनता की मांग को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया। जिसके बाद औपनिवेशिक प्रशासकों ने 1909 में सीमित चुनावों के माध्यम से भारतीय सदस्यों को बढ़ाया। एक विवादास्पद उपाय मुसलमानों के लिए एक अलग निर्वाचन क्षेत्र का भी था।
1920 में दिल्ली निवासी अब्दुल माजिद ब्रिटिश सरकार की नजर में आये। वह ऐसा व्यक्ति था जो आमतौर पर प्रशासन के रडार पर नहीं होता। उसी साल नवंबर में उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया। उनके विरोध में कुछ वकील और एक चूड़ी बेचने वाला खड़ा था। सरकार ने अब्दुल माजिद और चूड़ी विक्रेता को हास्यास्पद उम्मीदवार कहकर खारिज कर दिया।
चुनाव के दिन माजिद ने 288 वोट हासिल करके अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया। दूसरे स्थान पर रहे वकील को 26 वोट मिले। इस जीत के साथ, अब्दुल माजिद देश में सर्वोच्च कानून बनाने वाली संस्था के लिए चुने गए भारतीयों के चुनिंदा समूह में शामिल हो गए।
मोंटागु-चेम्सफोर्ड रिफॉर्म रिपोर्ट ने 1909 की चुनाव प्रक्रिया की कमियों पर प्रकाश डाला। रिपोर्ट में कहा गया है, “वर्तमान में सामान्य इंटरेस्ट के मतदाता शायद ही मौजूद हैं। लगभग सभी विशेष वर्गों या हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो लोग मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं उनका उद्देश्य काफी हद तक समावेशी होना था लेकिन वे भी कुछ सौ मतदाताओं तक ही सीमित हैं।”
मोंटागु-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने दो सदनों के साथ एक राष्ट्रीय विधायिका स्थापित करने की सिफारिश की। इस कानून बनाने वाली संस्था के एक सदन में जनता द्वारा सीधे निर्वाचित सदस्य होंगे। रिपोर्ट में निर्वाचित सदस्यों के साथ राज्य स्तर पर विधानमंडल स्थापित करने का भी सुझाव दिया गया है। ब्रिटिश संसद ने इन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया। तब तक बड़े पैमाने पर चुनावी कानून की कोई आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, इन सिफारिशों के लागू होने के साथ कानून निर्माताओं को लोगों द्वारा चुना जाना था।
देश में पहले बड़े पैमाने पर चुनाव कराने के लिए सरकार को एक चुनावी ढांचे की जरूरत थी। 1919 के कानून और इसके तहत बनाए गए नियमों ने चुनाव प्रक्रिया की मूल बुनियाद रखीं। साथ में, उन्होंने मतदान करने और चुनाव लड़ने के लिए योग्यताएं, और मतदाता सूची तैयार करने की व्यवस्था का भी जिक्र किया। योग्य मतदाताओं और उम्मीदवारों को ब्रिटिश प्रजा से होना चाहिए।
मतदान के लिए उम्र 21 वर्ष थी। चुनाव लड़ने के लिए यह 25 वर्ष थी। महिलाएं तब तक न तो मतदान कर सकती थीं और न ही चुनाव लड़ सकती थीं । कानून में विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों, जैसे मुसलमानों और गैर-मुसलमानों (ग्रामीण और शहरी दोनों के लिए), सिख, यूरोपीय, भूमिधारक और चैंबर ऑफ कॉमर्स के लिए भी प्रावधान दिया गया था। मतदाताओं और उम्मीदवारों को चुनाव में भाग लेने के लिए मूल निवास, आय और संपत्ति रखने के मानदंडों को भी पूरा करना होगा।
मोंटाग्यु-चेम्सफोर्ड रिफॉर्म लागू होने के बाद, ब्रिटिश सरकार ने 1920 के अंत में पहला प्रत्यक्ष चुनाव निर्धारित किया। उसी साल अगस्त में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। उस आंदोलन का एक हिस्सा चुनाव प्रक्रिया में भाग न लेना था। भावी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से हतोत्साहित किया गया। कुछ मामलों में, ऐसे व्यक्तियों को भी सामने रखा गया जिनकी सुधार प्रक्रिया का मजाक उड़ाने और ब्रिटिश सरकार को शर्मिंदा करने की क्षमता थी।
1919 के कानून और एक साल बाद हुए चुनावों के कारण विधायिका में अधिक भारतीय शामिल हो गए लेकिन वोट देने का अधिकार बहुत कम भारतीयों के पास था। आजादी के बाद से, हमारी संसद ने चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष रखने के लिए कानूनी प्रावधानों को मजबूत करने की दिशा में काम किया है। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह सुनिश्चित करना रहा है कि 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोग मतदान के लिए नामांकित हों।

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