Amethi Lok Sabha Elections 2024: अमेठी से फिर होने लगी राहुल गांधी के नाम की चर्चा, आंकड़ों से समझिए वो चुनाव लड़ेंगे या नहीं – Jansatta

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Lok Sabha Chunav 2024 Amethi: लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर पूरे देश में चर्चा है, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) तीसरी बार सत्ता में लौटेंगे या नहीं; लेकिन अमेठी में इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी (Rahul Gandhi) इस बार वहां से चुनाव लड़ेंगे या नहीं। राहुल के लड़ने या न लड़ने को लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि बीजेपी प्रत्याशी स्मृति इरानी (Smriti Irani) ने उन्हें 50 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया था।
वायनाड से लोकसभा सासंद राहुल गांधी ने इस बार फिर वायनाड से ही, लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर नामांकन दाखिल कर दिया है। 2019 के चुनाव में अमेठी के अलावा राहुल वायनाड से भी लड़े थे। अमेठी में हार के बावजूद, वायनाड के जीत के चलते वह संसद पहुंच गए थे। उस चुनाव के दौरान वह सीट सेफ मानाी जा रही थी लेकिन मामला थोड़ा सीरियस हो गया है।
दरअसल, इस बार केंद्र में कांग्रेस का सपोर्ट करने वाली केरल की सत्ताधारी पार्टी सीपीआई ने, वायनाड से पार्टी महासचिव डी राजा की पत्नी एनी राजा को उतारा है। वहीं बीजेपी ने भी इस सीट पर पूरा जोर लगाने के लिए प्रदेश पार्टी अध्यक्ष के सुरेंद्रन को उतार चुकी है। ऐसे में पिछली बार राहुल के लिए यह चुनाव जितना आसान था, शायद इस बार उतना आसान न रहे और उन्हें चुनाव प्रचार में ज्यादा मेहनत भी करनी पड़ सकती है।
ये तो बात रही वायनाड की, लेकिन इस समय चर्चा में वो अमेठी हैं, जहां से हार के चलते राहुल को वायनाड जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। पहले फेज के चुनाव में वोटिंग के लिए अब महज कुछ ही दिनों का वक्त है लेकिन अभी तक कांग्रेस ने अमेठी के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया है। सूत्र बताते हैं कि इसको लेकर पार्टी बिल्कुल अंतिम वक्त में ही फैसला ले सकती है।
जानकारी के मुताबिक अमेठी में पार्टी दूसरे फेज के बाद राहुल के नाम का ऐलान करने के मूड में है लेकिन फाइनल डिसीजन अभी भी नहीं हो पाया है कि राहुल अमेठी से लड़ेगे या नहीं। पार्टी के शीर्ष नेताओं ने राहुल के लड़ने या न लड़ने का फैसला, राहुल पर ही छोड़ रखा है।
बता दें कि 26 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के दूसरे फेज में वायनाड में वोटिंग होगी, जिसके बाद पार्टी अपना ध्यान अमेठी पर लगाएगी। अमेठी में 26 अप्रैल से तीन मई तक नामांकन होना है और 20 मई को वोटिंग होनी है। ऐसे में राहुल आसानी से चुनाव प्रचार भी कर सकेंगे। वहीं जमीनी स्तर पर फिलहाल अमेठी में राहुल को लेकर कुछ खास तैयारियां नहीं दिख रही हैं।
ऐसे में अगर लास्ट मोमेंट में कांग्रेस आलाकमान राहुल के अमेठी से लड़ने पर फैसला लेता है, तो यह राहुल के लिए चुनाव को मुश्किल बना सकता है। इसकी वजह यह है कि 2019 में राहुल गांधी के हारने के बाद कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व चरमराया हुआ है।
अमेठी वैसे तो कांग्रेस या कहें कि गांधी परिवार का गढ़ मानी जाती रही हैं लेकिन फिर भी एक नजर अमेठी के राजनीतिक इतिहास पर डालना भी जरूरी है। अमेठी आजादी के पहले चुनाव से ही चर्चा में रही थी, उस वक्त इसे सुल्तानपुर दक्षिण के नाम से जाना जाता था। यहां से पहले सांसद बालकृष्ण विश्वनात केशकर बने थे। इसके बाद 1957 में यह मुसाफिर खाना लोकसभा सीट का हिस्सा बनी थी और केशकर फिर जीते थे। यहां के राजा रणंजय सिंह 1977 तक सांसद रहे थे लेकिन फिर 1977 के चुनाव में रविंद्र प्रताप सिंह ने राजघाराने के संजय सिंह को हरा दिया था।
इसके बाद साल 1980 के चुनाव ने यहां जीत दर्ज की थी, और यहां से पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने जीत दर्ज की थी। जब संजय गांधी की 23 जून 1980 में एक्सीडेंट मे मृत्यु हो गई थी, तो यह सीट इंदिरा के बेटे राजीव ने संभाल ली थी। राजीव 1999 में इस सीट से सोनिया गांधी जीती थीं, और 2004 में यहां राहुल की एंट्री हुई और वे 2019 तक सांसद रहे थे। कुल मिलाकर कहें तो इस सीट से कांग्रेस 16 बार जीत चुकी है।
अमेठी का इतिहास साफ बता रहा है कि अमेठी कांग्रेस का गढ़ हैं और लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में स्मृति इरानी से मिली हार के बाद से कांग्रेस के मन में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यहीं है कि क्या राहुल अमेठी लौटें या नहीं। उनकी वापसी या बेरुखी दोनों के ही फैसले में अहम भूमिका पिछले कुछ लोकसभा चुनाव के आंकड़ों की हो सकती है।
आंकडों को देखें तो साल 1999 के लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पहली बार इस सीट से चुनाव लड़ा था और वह करीब 67 प्रतिशत वोट पाकर संसद पहुंची थी। उनकी जीत का अंतर करीब 3,00,012 वोटों का रहा था। दूसरे नंबर पर बीजेपी के संजय सिंह रहे थे।
सोनिया गांधी के रायबरेली से लड़ने के चलते अमेठी से राहुल गांधी ने अपना पहला चुनाव लड़ा था। राहुल 33 साल की उम्र में सांसद बने थे। राहुल की जीत का अंतर बीएसपी प्रत्याशी चंद्र प्रकाश मिश्रा के सामने करीब 2,90,853 का था।
साल 2009 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो राहुल गांधी को अमेठी में 32.42 प्रतिशत वोट मिले थे। वे बीएसपी के प्रत्याशी आशीष शुक्ला से करीब 370198 का था।
साल 2014 के चुनाव का जिक्र करें तो इसमें राहुल की जांत का अंतर काफी कम हो गया था। इसकी वजह यह थी कि बीजेपी ने स्मृति इरानी को उतारा था। राहुल की जीत का मार्जिन 1,07,093 रह गया था।
बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने साल 2014 के लोकसभा चुनावों में जहां राहुल को टक्कर दी थी, तो वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हरा दिया था। राहुल से स्मृति की जीत का अंतर 55,120 वोटों का ही रह गया था।
पिछले 5 चुनावों का रिकॉर्ड बता रहे हैं कि राहुल का ग्राफ 2009 में सर्वश्रेष्ठ था और 2014 में ही उनके लिए चुनौती खड़ी हो गई थी। ऐसे में इन रिकॉर्ड्स पर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी की भी नजर होगी। यह देखना अहम है कि इसके बाद पार्टी क्या फैसला लेती है।
अमेठी सीट पर राहुल के लड़ने या न लड़ने को लेकर कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय ने कहा है कि ‘सही वक्त’ आने पर अमेठी और रायबरेली की सीट के लिए प्रत्याशियों की घोषणा की जाएगी। उन्होंने कहा कि अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण लोकसभा क्षेत्र हैं। इस बारे में राष्ट्रीय नेतृत्व को जानकारी दे दी गई है। सीधे तौर पर देखा जाए, तो अभी सेंट्र्ल नेतृत्व के अलावा यूपी यूनिट को भी राहुल के अमेठी लौटने को लेकर कोई जानकारी नहीं है।

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