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Lok Sabha Election 2024 : कभी कम्यूनिस्टों के किले के तौर पर परिचित कांथी लोकसभा क्षेत्र को वर्तमान में तृणमूल का गढ़ माना जाता है. हालांकि इस बार यहां कड़े मुकाबले की संभावना जतायी जा रही है. आला नेताओं द्वारा खेमा बदले जाने से चुनावी रण के रोमांचक होने की उम्मीद जतायी जा रही है.
कोलकाता, आनंद सिंह : पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पिता शिशिर अधिकारी द्वारा जीती कांथी लोकसभा सीट को उपहार देना चाहते हैं. राज्य विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल के टिकट पर कांथी लोकसभा सीट से शिशिर अधिकारी को जीत मिली थी. इसके बाद राजनीतिक बिसात पर काफी हलचल हुई है. गत विधानसभा चुनाव से पहले शुभेंदु अधिकारी तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए. इसके बाद से ही अधिकारी परिवार के साथ तृणमूल की दूरियां बढ़ने लगीं. औपचारिक तौर पर भले ही शिशिर अधिकारी वर्तमान में तृणमूल के ही सांसद हैं लेकिन यह सर्वविदित है कि वह भाजपा के खेमे में हैं.
लोकसभा चुनाव में भाजपा 400 सीटें हासिल करके आयेगी सत्ता में : शुभेंदु अधिकारी
प्रधानमंत्री से लेकर अमित शाह की सभाओं में जाने से लेकर भाजपा उम्मीदवार के लिए प्रचार, सभी कुछ करते हुए उन्हें देखा गया है. ऐसी स्थिति में इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के ही जीतने की चुनौती शुभेंदु अधिकारी ने दी है. एक सभा में शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उनका लक्ष्य और उद्देश्य बेहद स्पष्ट है. इस बार के लोकसभा चुनाव में कांथी सीट को वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उपहार में देंगे. साथ ही उन्होंने कहा कि तीसरी बार श्री मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार का कांथी से जीतना क्यों जरूरी है, इसकी उन्होंने व्याख्या करते हुए कहा कि उनका लक्ष्य राज्य में डबल इंजन की सरकार बनाना है. इसी लक्ष्य के लिए कांथी में बड़े मार्जिन से जीत की जरूरत है. कमल निशान वाले उम्मीदवार को दिल्ली भेजना होगा. साथ ही उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में भाजपा 400 सीटें हासिल करके सत्ता में आयेगी.
कांथी की अधिकांश सीटों पर भाजपा की जीत
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि 2021 के विधानसभा चुनाव में कांथी की अधिकांश सीटों पर भाजपा की जीत हुई है. विधानसभा चुनाव के गणित के मुताबिक जिन लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा आगे है, उनमें कांथी भी शामिल है. गत विधानसभा चुनाव में कांथी लोकसभा क्षेत्र के सात विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने चार में जीत हासिल की थी. बाकी तीन विधानसभा क्षेत्रों में वह दूसरे स्थान पर थी. हालांकि कांथी की सभी बूथों पर पूर्ण कमेटी अभी तक भाजपा ने नहीं बनायी है. क्षेत्र में करीब 1600 बूथ हैं. इनमें से 70-72 बूथों पर पूर्ण कमेटी नहीं बनी है. मूल रूप से अल्पसंख्यक बहुल इलाके में यह समस्या देखी जा रही है. लेकिन भाजपा को विश्वास है कि बावजूद इन समस्याओं के कांथी में उसकी संभावना बेहद उज्जवल है.
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तृणमूल कांग्रेस के गढ़ कांथी में भाजपा की ललकार, मुकाबला होगा कांटेदार
पूर्व मेदिनीपुर जिले में स्थित कांथी लोकसभा क्षेत्र कभी माकपा का गढ़ माना जाता था. हालांकि बीच में 2004 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें तो 1999 के चुनाव से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को यहां विजयश्री का आशीर्वाद मतदाताओं ने दिया है. लेकिन इस बार मुकाबला रोमांचक होने की उम्मीद जतायी जा रही है. 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बसंत कुमार दास विजयी हुए थे. इसके बाद 1957 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रमथनाथ बंद्योपाध्याय यहां से सांसद बने. 1962 में कांग्रेस के बसंत कुमार दास फिर विजयी हुए. हालांकि इसके बाद समर गुहा लगातार तीन बार विजयी हुए. 1967 और 1971 में वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीते जबकि 1977 में वह जनता पार्टी के टिकट पर विजयी हुए. 1980 में सुधीर कुमार गिरि माकपा के टिकट पर यहां से सांसद बने. 1984 में कांग्रेस उम्मीदवार फूलरेनु गुहा को जीत मिली.
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1999 में पहली बार यहां से तृणमूल कांग्रेस की हुई जीत
लेकिन इसके बाद माकपा नेता सुधीर कुमार गिरि की जीत का डंका बजने लगा. 1989, 1991, 1996 और 1998 में वह यहां से जीतकर सांसद बने. 1999 में पहली बार यहां से तृणमूल कांग्रेस की जीत हुई. तृणमूल उम्मीदवार नीतीश सेनगुप्ता इस लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने. लेकिन माकपा ने 2004 के चुनाव में फिर से वापसी की और उसके उम्मीदवार प्रशांत प्रधान को इस लोकसभा सीट से जीत हासिल हुई. हालांकि इसके बाद से यहां तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व कायम हो गया. 2009 में शिशिर अधिकारी यहां से 6.06 लाख वोट हासिल करके विजयी हुए. कुल मतदान का उन्हें 54.95 फीसदी हिस्सा मिला. दूसरे स्थान पर माकपा के प्रशांत प्रधान थे. उन्हें 4.77 लाख वोट मिला. शिशिर अधिकारी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भी अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा. उन्हें 6.76 लाख वोट मिले.
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राजनीतिक विश्लेषक इस बार यहां कड़े मुकाबले की उम्मीद जता रहे है
दूसरे स्थान पर माकपा के तापस सिन्हा थे. उन्हें 4.48 लाख वोट मिले थे. शिशिर अधिकारी का विजय रथ यहीं नहीं थमा. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने 7.11 लाख वोट हासिल करते हुए जीत दर्ज की. उन्होंने भाजपा उम्मीदवार डॉ देबाशीष सामंत को करीब 1.11 लाख वोटों से हराया. 2019 में माकपा का जोर यहां खत्म हो गया था. माकपा उम्मीदवार परितोष पट्टयानायक को महज 76 हजार वोट ही मिले. वह तीसरे स्थान पर रहे. भाजपा की ओर से इस बार शिशिर अधिकारी के बेटे और राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के भाई सोमेंदु अधिकारी को अपना उम्मीदवार बनाया गया है. तृणमूल ने उत्तम बारिक को टिकट दिया है. राजनीतिक विश्लेषक इस बार यहां कड़े मुकाबले की उम्मीद जता रहे हैं.
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भाजपा ने यहां बनायी है अपनी राजनीतिक जमीन
कांथी लोकसभा क्षेत्र पर गौर करें तो यहां कभी भाजपा को जनाधार ही नहीं था. 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार अमलेश मिश्रा को करीब 32 हजार वोट ही यहां हासिल हुए थे. 2014 में अपनी स्थिति में पार्टी ने बेहतरी लाई. भाजपा उम्मीदवार कमलेंदु पहाड़ी को 1.11 लाख वोट मिल गये. 2019 के लोकसभा चुनाव में तो भाजपा उम्मीदवार डॉ देबाशीष सामंत को 6 लाख से अधिक वोट मिल गये. कांथी लोकसभा क्षेत्र पर गौर करें तो यहां के सात विधानसभा क्षेत्रों में से चार में भाजपा विधायक हैं. कांथी उत्तर, भगवानपुर, खेजुरी और कांथी दक्षिण में भाजपा के विधायक हैं. जबकि चंडीपुर, पटाशपुर और रामनगर में तृणमूल के विधायक हैं. अब भाजपा के साथ अधिकारी परिवार भी है जिनका इस क्षेत्र में वर्चस्व माना जाता है. ऐसे में भाजपा की स्थिति पूर्व की तुलना में काफी मजबूत हुई है. इसलिए यहां एक मजबूत लड़ाई की उम्मीद जतायी जा रही है.
विधानसभा क्षेत्र पार्टी विधायक
मतदाताओं के आंकड़े
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