Gulbarga Loksabha Election 2024: अंबेडकर की मूर्त‍ि का अपमान, दल‍ित की आत्‍महत्‍या ने बढ़ा दी है मल्‍ल‍िकार्जुन खड़गे के दामाद की मुश्‍क‍िल – Jansatta

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लोकसभा चुनाव 2024 के तीसरे चरण में आज 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 93 लोकसभा क्षेत्रों में मतदान हो रहा है। इनमें से एक कर्नाटक की गुलबर्गा सीट कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गई है। इस सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार खड़गे के दामाद राधाकृष्ण डोड्डामणि हैं। वहीं, गुलबर्गा में भाजपा ने मौजूदा सांसद उमेश जाधव को दोबारा मैदान में उतारा है।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने पिछले कुछ दिनों में गुलबर्गा में कई रैलियों को संबोधित किया है। खड़गे ने खुद 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में गुलबर्गा सीट जीती थी लेकिन 2019 में वह यहां से हार गए थे। गुलबर्गा सीट कांग्रेस अध्यक्ष के लिए इस बार नाक की लड़ाई है। हाल ही में एक भाषण में मल्लिकार्जुन खड़गे ने गुलबर्गा के मतदाताओं से भावनात्मक अपील की थी। उन्होंने कहा था कि अगर जनता ने इस बार पार्टी को वोट नहीं दिया तो उन्हें यह एहसास हो जाएगा कि क्षेत्र में उनके लिए कोई जगह नहीं है।
खड़गे ने अफजलपुर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा था, “मुझे (कांग्रेस) आपका वोट मिले या न मिले लेकिन आप कम से कम मेरे अच्छे कामों को याद करके मेरे अंतिम संस्कार में आएं। अगर मेरे अंतिम संस्कार के समय अधिक लोग जुटेंगे तो दूसरों को एहसास होगा कि मैंने कुछ अच्छे काम किए हैं। मैं अपील करता हूं कि आपका वोट बर्बाद नहीं होना चाहिए।” कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी 30 अप्रैल को गुलबर्गा में राधाकृष्ण डोड्डामणि के लिए वोट मांगे थे।
राधाकृष्ण डोड्डामणि के लिए वोट मांगते समय मल्लिकार्जुन खड़गे खुद इस क्षेत्र के लिए किए गए सभी कार्यों को रेखांकित कर रहे हैं। खड़गे ने कहा कि उन्हें 2019 की हार के लिए कोई शिकायत नहीं है लेकिन ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए वरना मुझे विश्वास हो जाएगा कि मेरे लिए यहां और आपके दिलों में कोई जगह नहीं है।” उन्होंने कहा कि उनका जन्म राजनीति करने के लिए और भाजपा और आरएसएस की विचारधारा को हराने के लिए हुआ है।
वहीं, स्थानीय कांग्रेस नेता अबरार सैत मानते हैं कि डोड्डामणि को टिकट देने से बचा जा सकता था। मल्लिकार्जुन खड़गे को खुद चुनाव लड़ना चाहिए था या अपने परिवार के बाहर के किसी व्यक्ति को नामांकित करना चाहिए था। खड़गे सिद्धांतवादी माने जाते हैं लेकिन राधाकृष्ण को मैदान में उतारने के फैसले से गलत संकेत गया है।”
गुलबर्गा में हाल ही में जातीय हिंसा की घटनाएं सामने आई जिससे वहां स्थिति तनावपूर्ण हो गयी है। 30 अप्रैल 2024 को दलित युवाओं के एक समूह पर कलबुर्गी जिले में बी आर अंबडेकर की मूर्ति के अपमान को लेकर प्रमुख लिंगायत समुदाय के एक सदस्य के घर पर हमला करने का आरोप लगाया गया था। उसके अगले ही दिन एससी/एसटी अत्याचार मामले में आरोपी पिछड़ी जाति के एक युवक की आत्महत्या की खबर आई।
इससे पहले राधाकृष्ण डोड्डामणि खड़गे की गुडविल और कर्नाटक में कांग्रेस की महिलाओं के लिए लोकप्रिय वेलफ़ेयर स्कीम्स का इस्तेमाल कर तेजी से प्रचार कर रहे थे। पार्टी अपनी ओर से, राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान किए गए वादों के साथ-साथ पार्टी के राष्ट्रीय घोषणापत्र में उल्लिखित 25 सामाजिक कल्याण गारंटियों को पूरा करने का भरोसा जता रही है। कांग्रेस के बड़े नेताओं में मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे के अलावा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके डिप्टी डीके शिव कुमार ने भी डोड्डामणि का समर्थन करने के लिए गुलबर्गा में अभियान चलाया था। हालांकि, कई स्थानीय लोगों का कहना है कि अब उनके लिए राह आसान नहीं होगी।
स्थानीय कांग्रेस नेता सी बी पाटिल भी इस बात को स्वीकार करते हैं, “गुलबर्गा में चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों या घोषणापत्रों से तय नहीं होते हैं। यहां भावनात्मक मुद्दे हावी रहते हैं। हाल ही में हुई जातीय हिंसा की दो घटनाएं संभवतः यहां चुनाव के नतीजे तय करेंगी।” 3 मई को कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय को शांत करने के लिए एक बैठक की। भीमशंकर पाटिल ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “नुकसान हो चुका है। कांग्रेस आगे थी, महिलाएं उसके पक्ष में थीं लेकिन रातों-रात हालात बदल गए हैं।” पाटिल ने कहा, “30 अप्रैल को लिंगायत सदस्य के घर पर हुए हमले में महिलाओं को भी पीटा गया था। लगभग 60% लोग कांग्रेस के पक्ष में थे लेकिन अब स्थिति उलट गई है। समुदाय गुस्से में है।”
इन घटनाओं से पहले कांग्रेस के आत्मविश्वास का एक अन्य कारण वर्तमान भाजपा सांसद उमेश जाधव के खिलाफ लोगों का असंतोष था। उन्होंने इस क्षेत्र में कुछ खास काम नहीं किया है। एक मजदूर नागप्पा येरगोल ने इंडियन एक्स्प्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “जाधव ने अपने कार्यकाल के दौरान किसी परियोजना का उद्घाटन करने के लिए एक रिबन भी नहीं काटा है। उन्हें देखा भी नहीं गया है। वह सिर्फ नरेंद्र मोदी के कंधों पर खड़े हैं। खड़गे ने दलितों को सशक्त बनाया है। वहीं एक दलित ड्राइवर मारुति कहते हैं, “हम खड़गे के पक्ष में हैं। हमारे लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं है।”
3 मई को वीरशैव लिंगायतों के लिए आयोजित सम्मेलन में कांग्रेस के बड़े लिंगायत नेताओं ने समुदाय से खड़गे से मुंह न मोड़ने की अपील की। कांग्रेस नेता मतदाताओं से कह रहे हैं कि गठबंधन के जीतने की स्थिति में मल्लिकार्जुन खड़गे प्रधानमंत्री बन सकते हैं। बैठक को संबोधित करने वाले गुलबर्गा दक्षिण कांग्रेस विधायक अल्लमप्रभु पाटिल ने इंडियन एक्स्प्रेस से बातचीत के दौरान कहा कि यह भाजपा है जो लिंगायत विरोधी है। आरएसएस को हम पर भरोसा नहीं है। उन्होंने आरक्षण नहीं दिया जबकि यह आसान था। खड़गे ने ईएसआई अस्पताल से लेकर हवाई अड्डे तक इस क्षेत्र में बहुत योगदान दिया है।”कर्नाटक के चिकित्सा शिक्षा मंत्री शरण प्रकाश पाटिल जोकि खड़गे के करीबी सहयोगी रहे हैं, उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने लिंगायत सदस्य के घर पर हमले की मुखर निंदा की थी।
हालांकि, भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने कांग्रेस और खड़गे का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर हो रहे राजनीतिक बदलाव को दर्शाता है। कांग्रेस नेता सी बी पाटिल यहां लिंगायतों के प्रभाव को स्वीकार करते हैं। एक लिंगायत नेता कहते हैं, ”कई लिंगायतों को मल्लिकार्जुन खड़गे के राजनीतिक प्रभुत्व से खतरा महसूस होता है।” उन्होंने कहा कि हाल की घटनाओं ने उनकी आशंका को और मजबूत कर दिया है।
यहां तक ​​कि कलबुर्गी में अन्य गैर-दलित समूहों को भी लगता है कि खड़गे परिवार की निगरानी में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम को हथियार बना दिया गया है। कलबुर्गी लिंगायत नेता क्षेत्र में बड़ी संख्या में इस तरह के मामले दर्ज होनेकी बात करते हैं। कुछ लोग 2019 में गुलबर्गा से कांग्रेस अध्यक्ष की एक लाख से अधिक वोटों से हार को बदलाव के साथ-साथ मोदी लहर के असर के रूप में देखते हैं।
गुलबर्गा की आबादी में दलित लगभग 35% हैं वहीं लिंगायत भी लगभग 30% हैं। लिंगायत जहां भाजपा का वोट बैंक हैं, कांग्रेस ने यहां खड़गे के होलेया दलित समुदाय के साथ-साथ मुसलमानों (जनसंख्या का 20%) और ओबीसी के एक वर्ग (कुल मिलाकर 20%) का भरोसा हासिल किया है। लिंगायतों के अलावा, बीजेपी भी जाधव को टिकट देने के कारण एससी के भीतर लम्बानी के अलावा ओबीसी के एक वर्ग का सपोर्ट मिलने की उम्मीद कर रही है।
पिछले आम चुनाव में इस सीट से कांग्रेस अध्यक्ष 8% से अधिक वोटों से हारे थे।

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