यूपी में बकरीद पर घरों में बकरों की कुर्बानी का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। मऊ के मुहम्मद शाहिद ने कोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने कहा- पुलिस घर में कुर्बानी से रोक रही है।
मंगलवार को जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और मनीष कुमार निगम की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने यूपी सरकार से जवाब मांगा है। मामले में कल यानी बुधवार को फिर से सुनवाई होगी।
मुहम्मद शाहिद ने कहा- मैंने 7 जून को याचिका दाखिल की थी। मेरे गांव के लोग हर साल बकरीद पर घरों में जानवरों की कुर्बानी करते आ रहे हैं। पिछले साल पुलिस ने धमकी देकर इसकी जांच की। इस बार भी पुलिस धमकी दे रही कि जानवरों की घर में कुर्बानी नहीं की जाएगी।
उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्रवाई गैर कानूनी है। इसलिए मैंने कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है।
अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बोले- सड़क या खुली जगहों पर कुर्बानी न करें
इस मामले को लेकर दैनिक भास्कर ने यूपी अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष अशफाक सैफी से बात की। उन्होंने कहा- सड़क पर या खुली जगहों पर कुर्बानी न करें। बकरीद पर उन्हीं जानवरों की कुर्बानी दी जाए, जिसकी कानून इजाजत देता है।
उन्होंने कहा- नमाज के समय ईदगाह और मस्जिदों में काफी भीड़ रहती है। अधिकारियों से मांग की गई कि बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और साफ सफाई का ध्यान रखा जाए। धार्मिक स्थल के बाहर सड़क पर कोई भी नमाज न अदा करें।
अशफाक सैफी ने प्रमुख सचिव, गृह विभाग, नगर विकास विभाग, DGP, कलेक्टर, पुलिस विभाग, न्याय पंचायत को पत्र लिखा है। इसमें जानवरों की खरीद-फरोख्त को लेकर व्यापारियों को परेशान न करने की मांग की। पुलिस से अराजकतत्वों पर नकेल कसने की बात भी कही गई है।
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बालिग लड़के-लड़की लिव-इन में रह सकते हैं:शादी से कोई नहीं रोक सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- 18 साल से अधिक उम्र के लड़के-लड़की अपनी मर्जी से साथ रह और शादी कर सकते हैं। यह उसे मिले जीवन का मूल अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि राज्य का दायित्व है कि मानव जीवन की रक्षा करें। कोर्ट ने उस मजिस्ट्रेट की आलोचना की है जिसके सामने वयस्क लड़की ने अपने चाचा व परिवार से जान का खतरा बताया और मजिस्ट्रेट ने FIR की बजाए उन्हीं लोगों को लड़की की अभिरक्षा सौंप दी। पढ़ें पूरी खबर
न्यायिक कार्यों में भेदभाव वाला अधिकारी घोर कदाचार का आरोपी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत के लिए एक आवेदन को स्वीकार करते हुए कहा है कि असंगत न्यायिक आदेशों से आरोपी व्यक्तियों के बीच भेदभाव हो सकता है। खासकर जब तथ्य और परिस्थितियां समान या एक समान हों।
कोर्ट ने आगे कहा- इस तरह के असंगत आदेश न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और अखंडता के बारे में जनता की धारणा को कमजोर करते हैं। यही नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक कार्यों में भेदभाव करने वाला अधिकारी घोर कदाचार करता है। पढ़ें पूरी खबर
PCS जे उत्तर पुस्तिका मामले में एक जुलाई को सुनवाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीसीएस जे मुख्य परीक्षा 2022 में शामिल अभ्यर्थी की याचिका पर एक जुलाई को सुनवाई करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि लोक सेवा आयोग अभ्यर्थी के सभी 6 प्रश्न पत्रों की उत्तर पुस्तिकाएं कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें। पढ़ें पूरी खबर
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