इस लोकसभा चुनाव में BJP ने कोस्टल स्टेट्स यानी, तटीय राज्य पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा में मजबूत एंट्री की है। 2014 में इन पांचों राज्यों को मिलाकर BJP सिर्फ 6 सीटें ही जीत पाई थी। इस बार BJP ने इन राज्यों में कुल 36 सीटें हास
यानी, 10 साल में BJP की सीटों में 500% का इजाफा हुआ है। मोदी की लीडरशिप में हुए तीन लोकसभा चुनावों में BJP का वोट शेयर भी करीब 17% बढ़ा है।
आज मोहन चरण माझी ओडिशा के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। यह पहली बार है, जब भारत के किसी तटीय राज्य में BJP का मुख्यमंत्री होगा। इस बार ओडिशा विधानसभा चुनाव में BJP को 147 में से 78 सीटें मिली हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ 23 सीटें ही जीत पाई थी।
ओडिशा के साथ ही एक और तटीय राज्य आंध्र प्रदेश में BJP, TDP के साथ सरकार का हिस्सा होगी। आंध्र प्रदेश में BJP ने 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसे 8 सीटों पर जीत मिली।
दरअसल गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक की सीमाएं भी समुद्र से लगती हैं, लेकिन राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा को तटीय राज्य माना जाता है। इन राज्यों में पारंपरिक रूप से BJP कमजोर मानी जाती थी।
गुजरात, गोवा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में BJP का पहले से दबदबा रहा है। इन चारों राज्यों में BJP की सरकार रही है। फिलहाल कर्नाटक को छोड़कर तीनों राज्यों में BJP सत्ता में है।
इस लोकसभा चुनाव में भी BJP ने गुजरात और कर्नाटक में कोस्टल रीजन की सभी सीटें जीत ली हैं। जबकि महाराष्ट्र में NDA ने कोस्टल रीजन की 12 में से 7 सीटों पर जीत हासिल की है।
ओडिशा : 10 साल में 20 गुना हो गए BJP सांसद
2014 लोकसभा चुनाव में BJP को ओडिशा में 21 में से सिर्फ 1 सीट मिली थी। इस लोकसभा चुनाव में BJP को 20 सीटें मिली हैं। यानी, 95 प्रतिशत सीटों पर BJP काबिज हो गई है। पिछले 10 साल में BJP की सीटें 20 गुना बढ़ी हैं।
2014 के ओडिशा विधानसभा चुनाव में BJP को 10 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 78 पहुंच गया है। यानी, 2014 के मुकाबले अब 68 ज्यादा।
पश्चिम बंगाल : मोदी के पहले 3 चुनावों में BJP की कुल 2 सीटें, मोदी की लीडरशिप में लड़े तीन चुनावों में कुल 32 सीटें
मोदी के PM बनने से पहले पश्चिम बंगाल में BJP तीन लोकसभा चुनावों को मिलाकर सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई थी। 1999 लोकसभा चुनाव में BJP को पश्चिम बंगाल में 2 सीटें मिलीं। 2004 और 2009 लोकसभा चुनाव में BJP का पश्चिम बंगाल में खाता नहीं खुला था।
2014 लोकसभा चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा गया। तब पश्चिम बंगाल में BJP को सिर्फ 2 सीटें मिलीं, लेकिन 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 18 पहुंच गया।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को 6 सीटों का नुकसान हुआ और वह 12 सीटें ही जीत सकी। इस तरह मोदी एरा में तीन लोकसभा चुनावों को मिलाकर BJP को 32 सीटें मिलीं। यानी, मोदी एरा में BJP की सीटों में 1500 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले पश्चिम बंगाल में 2011 में विधानसभा चुनाव हुए। BJP को एक भी सीट नहीं मिली। उसका वोट शेयर महज 4 प्रतिशत रहा।
मोदी के PM बनने के 2 साल बाद 2016 में विधानसभा चुनाव हुए। BJP को तीन सीटें मिलीं और वोट शेयर बढ़कर 10.3 प्रतिशत पहुंच गया। इसके बाद 2021 में विधानसभा चुनाव हुए। BJP ने 77 सीटें जीत लीं। वोट शेयर बढ़कर 38.5 प्रतिशत पहुंच गया। यानी, 10 साल में करीब 34 प्रतिशत वोट शेयर बढ़ गया। आज BJP पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी है।
केरल : पहली बार BJP का खाता खुला, मोदी के दौर में 17% बढ़ा वोट शेयर
इस लोकसभा चुनाव में BJP को केरल में एक सीट मिली है। त्रिशूर लोकसभा सीट से BJP के सुरेश गोपी ने CPI के सुनील कुमार को करीब 75 हजार वोटों से हराया है। इससे पहले कभी केरल में BJP का कोई सांसद नहीं था।
मोदी के PM बनने से तीन चुनाव पहले यानी, 1999 में BJP को 6.6 प्रतिशत, 2004 में 10.4 प्रतिशत और 2009 में 6.3 प्रतिशत वोट मिले। यानी तीनों चुनावों को मिलाकर कुल 23.3 प्रतिशत वोट शेयर।
2014, 2019 और 2024 में BJP मोदी के चेहरे पर लोकसभा चुनाव में उतरी। 2014 में उसे 10.5 प्रतिशत, 2019 में 13 प्रतिशत और 2024 में 16.68 प्रतिशत वोट मिले। यानी, तीन चुनावों को मिलाकर कुल 40.18 प्रतिशत। इस तरह मोदी के पीएम बनने से तीन चुनाव पहले और मोदी के चेहरे पर लड़े तीन चुनावों की तुलना करने पर पता चलता है कि BJP का वोट शेयर करीब 17 प्रतिशत बढ़ गया।
आंध्र प्रदेश : 5 साल में 10% बढ़ गया BJP का वोट शेयर
तेलंगाना के अलग होने के बाद आंध्र प्रदेश में 2014 में लोकसभा चुनाव हुए। 25 सीटों में से BJP को 2 सीटों पर जीत मिली। उसका वोट शेयर 7.2 प्रतिशत रहा। तब BJP चंद्रबाबू नायडू की TDP के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी।
2019 लोकसभा चुनाव में BJP अकेले उतरी। उसे कोई सीट नहीं मिली और वोट शेयर फिसलकर 1 प्रतिशत पहुंच गया।
2024 लोकसभा चुनाव में BJP और TDP फिर से साथ मिलकर लड़ीं। इस बार BJP को तीन सीटों पर जीत मिली और उसका वोट शेयर 11.28 प्रतिशत बढ़ गया। यानी, पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले BJP का वोट शेयर करीब 10 प्रतिशत बढ़ गया।
वहीं आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों की बात करें, तो 2019 में BJP ने 173 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। पार्टी को कोई सीट नहीं मिली। 2024 विधानसभा चुनाव में BJP ने TDP के साथ गठबंधन किया और 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। इसमें से 8 सीटों पर BJP को जीत मिली।
तमिलनाडु : 10 साल में BJP का वोट शेयर 6 प्रतिशत बढ़ा, इस बार 9 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही
तमिलनाडु में BJP को 2014 लोकसभा चुनाव में 1 सीट मिली थी। उसका वोट शेयर 5.5 प्रतिशत था। इस बार BJP को तमिलनाडु में कोई सीट नहीं मिली है, लेकिन उसका वोट शेयर 11.24 प्रतिशत पहुंच गया है। यानी, 10 साल में BJP का वोट शेयर करीब 6 प्रतिशत बढ़ गया है। इस लोकसभा चुनाव में BJP तमिलनाडु की 9 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही है।
तटीय भारत में BJP की कामयाबी की 5 बड़ी वजह
1. स्थानीय सरकारों के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का मुद्दा
सीनियर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी बताते हैं, ‘ओडिशा में स्थानीय सरकार के प्रति एंटी इनकम्बेंसी बड़ा मुद्दा था। लंबे समय से BJD की सरकार थी। नवीन पटनायक की दिलचस्पी नेशनल मुद्दों को लेकर नहीं थी। मोदी यहां के लोगों के बीच ये नैरेटिव सेट करने में कामयाब रहे कि BJD जानबूझकर गरीबी खत्म नहीं कर रही। मोदी ने यहां की लोकल पॉलिटिक्स को नेशनल प्राइड और नेशनल सेंटिमेंट्स से जोड़ा। इसका BJP को फायदा मिला।’
वे आगे कहते हैं- ‘पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक लेफ्ट की सरकार रही। उसके खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का मुद्दा उठाकर ममता बनर्जी ने सत्ता हासिल की। अब BJP, ममता बनर्जी के खिलाफ मुद्दे बनाकर बढ़त हासिल कर रही है। वहां TMC और BJP के अलावा कोई और पार्टी मैदान में बची नहीं। ऐसे में जो लोग ममता बनर्जी की पॉलिटिक्स को पसंद नहीं करते हैं, वे BJP की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं।’
ओडिशा के सीनियर जर्नलिस्ट रविंद्र कुमार कहते हैं, ‘यहां 24 साल से BJD की सरकार थी। नवीन पटनायक लगातार मुख्यमंत्री बने हुए थे। यहां के लोग एक बार BJP को आजमाना चाहते थे। इसलिए विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में यहां के लोगों ने BJP को वोट किया। BJP की कामयाबी की बड़ी वजह ये भी है कि उसके नेता लगातार यहां जमे रहे। स्थानीय लोगों को केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कार दिए।’
2. स्थानीय पार्टियों के साथ गठबंधन
तमिलनाडु में BJP ने किसी बड़ी पार्टी से गठबंधन नहीं किया, लेकिन छोटी-छोटी तीन पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ी। इसी तरह आंध्र और केरल में भी BJP ने स्थानीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया। इसका BJP को फायदा भी हुआ।
केरल में जहां BJP खाता खोलने में कामयाब रही, वहीं आंध्र में उसने तीन सीटें जीत लीं। तमिलनाडु में BJP भले ही कोई सीट नहीं जीत पाई, लेकिन उसका वोट शेयर 10 साल में करीब 6 प्रतिशत बढ़ गया।
हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं, ‘आंध्र प्रदेश में BJP, TDP गठबंधन की वजह से ही अच्छा कर पाई। वहां उसका अपना कोई खास जनाधार नहीं है। इसका फायदा TDP को भी मिला, क्योंकि वो भी अकेले YSR कांग्रेस से मजबूती के साथ नहीं लड़ सकती थी।’
आपको बता दें कि 2019 लोकसभा और विधानसभा चुनाव में BJP आंध्र प्रदेश में अकेले लड़ी थी। दोनों ही चुनावों में उसका खाता नहीं खुला था।
हालांकि पश्चिम बंगाल और ओडिशा में BJP अकेले ही चुनाव में उतरी थी। ओडिशा में BJD के साथ गठबंधन की चर्चा हुई थी, लेकिन दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर सहमति नहीं बन पाई। ओडिशा में अकेले लड़ने का फायदा BJP को मिला और वह 21 में से 20 सीटें जीत गई।
3. हर चौथे दिन किसी न किसी तटीय राज्य में रहे PM मोदी
1 जनवरी 2024 से लेकर 31 मई 2024 के बीच पांच तटीय राज्यों में PM मोदी 33 बार गए। पश्चिम बंगाल में 11 बार, केरल और तमिलनाडु में 6-6 बार, ओडिशा में 5 बार और आंध्र प्रदेश में 2 बार प्रधानमंत्री पहुंचे।
4. राम और हिंदुत्व की पॉलिटिक्स
इस लोकसभा चुनाव में नॉर्थ इंडिया में राम मंदिर और हिंदुत्व पॉलिटिक्स का फायदा BJP को नहीं हुआ, लेकिन तटीय राज्यों में उसे बढ़त मिली है। पांचों तटीय राज्यों यानी पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा में BJP ने राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था।
वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी बताते हैं, ‘पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में BJP ने लोगों को राम से जोड़ने की कोशिश की। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी इन पांचों राज्यों में राम से जुड़े कई मंदिरों में गए। स्थानीय भाषाओं में लिखे रामायण का पाठ किया। इसका फायदा BJP को लोकसभा चुनाव में हुआ है।’
5. सांस्कृतिक विरासत पर फोकस
हर्षवर्धन त्रिपाठी बताते हैं, ‘प्रधानमंत्री ने तटीय राज्यों में सांस्कृतिक विरासत पर खूब फोकस किया। इसी कड़ी में उन्होंने नई संसद में सेंगोल की स्थापना की। संत तिरुवल्लुवर का सम्मान किया। दक्षिण के राज्यों में कई मंदिरों का उद्घाटन किया।’
ओडिशा में भी BJP ने BJD सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट श्री जगन्नाथ हेरिटेज कॉरिडोर का मुद्दा उठाया। चुनावी सभाओं में पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने BJD सरकार पर आरोप लगाया कि इन्होंने पुरी को टूरिस्ट हब बनाने की होड़ में धर्म को पीछे छोड़ दिया है।
BJP अब तक तटीय राज्यों में कामयाब क्यों नहीं हो पा रही थी, 3 बड़ी वजह
1. धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण मुश्किल, यहां मुस्लिम आक्रांता के रूप में नहीं आए
केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का मुद्दा उतना कारगर नहीं है, जितना उतर भारत में है। पॉलिटिकल एनालिस्ट सुमंत सी रमण इसकी वजह बताते हैं- ‘यहां के लोगों को धर्म के आधार पर बांटना मुश्किल है, क्योंकि यहां इस्लाम आक्रांता के रूप में नहीं आया। यहां के लोग मंदिर-मस्जिद जाते हैं, अपने धर्म को फॉलो करते हैं। यहां धर्म या मंदिर-मस्जिद राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाता।’
ओडिशा में मुस्लिम और ईसाई आबादी करीब 2-2 प्रतिशत है। यानी, ना के बराबर। जबकि यहां हिंदू 93 प्रतिशत हैं। इसलिए यहां हिंदू-मुस्लिम या धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की गुंजाइश बेहद कम है।
हालांकि, पश्चिम बंगाल हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण मामले में बाकी राज्यों से अलग है। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद BJP यहां TMC सरकार पर लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाती रही है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक पिछले कुछ सालों में BJP यहां ध्रुवीकरण को मुद्दा बनाने में भी कामयाब रही है।
2. भाषा और कल्चर की वजह से BJP पर बाहरी पार्टी का तमगा
आमतौर पर BJP हिंदी पट्टी की पार्टी मानी जाती है। जबकि कोस्टल एरिया के पांचों राज्य यानी पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल गैर हिंदी भाषी राज्य हैं।
यहां स्थानीय भाषाओं का वर्चस्व रहा है। इन राज्यों में आए दिन हिंदी को लेकर विरोध प्रदर्शन भी होते रहे हैं। इस वजह से BJP यहां उतनी कामयाब नहीं हो पा रही थी, जितनी वो हिंदी पट्टी के राज्यों में थी।
बेंगलुरु के गीतम यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अरुण कुमार एक मीडिया इंटरव्यू में बताते हैं- ‘BJP और RSS के बड़े नेता हिंदी का फेवर करते रहे हैं। उनके दबाव में स्थानीय BJP नेता भी लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं कि हिंदी के इस्तेमाल से तमिल पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। इससे यहां के लोगों को लगता है कि BJP बाहरी पार्टी है।’
3. BJP के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं होना
2014 से पहले कोस्टल एरिया के किसी भी राज्य में BJP के पास स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा नेता नहीं था। इस वजह से 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के बाद भी BJP इन राज्यों में कुल 6 सीटें ही जीत पाई थीं।
पश्चिम बंगाल में जिन दो सीटों पर BJP को जीत मिली थी, दोनों बड़े नाम थे। एसएस अहलूवालिया दार्जलिंग से और बाबुल सुप्रियो आसनसोल से चुनाव जीते थे। 2014 लोकसभा चुनाव जीतने से पहले एसएस अहलूवालिया 20 साल से राज्यसभा सांसद थे। वहीं, बाबुल सुप्रियो जाने-माने प्लेबैक सिंगर थे।
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