बिहार में लेफ्ट पार्टियों को लोकसभा चुनाव में जबरदस्त बढ़त मिली। तीन में से 2 सीटों पर माले की जीत हुई है। सीपीआई और सीपीएम भी एक-एक सीट पर चुनाव लड़ रही थी, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। जिन दो सीटों पर माले ने जीत दर्ज की वह हॉट सीट थी।
तरारी से माले विधायक सुदामा प्रसाद ने आरा में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी प्रत्याशी आरके सिंह को हराया। दूसरी जीत काराकाट में हुई। यहां से एनडीए के प्रत्याशी उपेन्द्र कुशवाहा और निर्दलीय पवन सिंह मैदान में थे।
पवन सिंह भोजपुरी फिल्मों के स्टार हैं। काराकाट में माले के राजाराम सिंह ने जीत दर्ज की। तीन सीटों पर चुनाव लड़ते हुए माले ने दो सीटों पर जीत का लाल झंडा गाड़ा।
राजपूत नेता को कानू जाति के नेता ने हराया
आरा में माले ने आरके सिंह की जीत की हैट्रिक पर ब्रेक लगा दिया। राजपूत नेता आरके सिंह की हार हुई और अत्यंत पिछड़ी जाति कानू से आने वाले सुदामा प्रसाद जीत गए। इससे पहले बिहार में 1989 में आरा से रामेश्वर महतो सांसद चुने गए थे। वे नोनिया जाति से थे। यानी 35 सालों के बाद माले ने एक बार फिर अपनी उपस्थिति दर्ज की है।
बता दें माले ने आरा, काराकाट और नालंदा में उम्मीदवार उतारा था। नालंदा के बारे में आम राय है कि इस सीट पर भले ही नीतीश कुमार नहीं लड़ते हैं पर यह उन्हीं की सीट है। यहां से कौशलेन्द्र फिर जीते। नालंदा का सच यह भी है कि यहां की सात विधानसभा क्षेत्रों में पांच पर जेडीयू का कब्जा है और एक पर बीजेपी का।
आरा के अगिआंव विधानसभा उपचुनाव में भी माले की जीत
अगिआंव सीट मनोज मंजिल को आजीवन कारावास की वजह से यह सीट खाली हुई थी। यहां विधानसभा उपचुनाव, लोकसभा चुनाव के साथ ही कराया गया। उम्मीद थी कि माले यहां से मनोज मंजिल की पत्नी को टिकट देगी और सहानुभूति वोट हासिल करेगी। लेकिन इसके उलट माले ने संघर्ष का रास्ता ही चुना। यहां से माले के युवा नेता शिव प्रकाश रंजन को उम्मदीवार बनाया। शिवप्रकाश ने जीत दर्ज की। शिवप्रकाश ने प्रभुनाथ प्रसाद को हराया। शिवप्रकाश को 73,191 और प्रभुनाथ को 43,334 वोट मिले।
विधान सभा सत्र में माले का चेहरा जन आंदोलन वाला दिखता रहा
माले नीतीश-तेजस्वी सरकार के साथ बिहार विधान सभा में रही, लेकिन विधानसभा पोर्टिकों में पार्टी के विधायक पोस्टर लेकर जनता के सवाल पर सरकार को घेरते भी दिखे। सदन के अंदर भी माले ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरा। खास तौर से शिक्षकों की बहाली और समस्याओं को लेकर मुखर चेहरा सामने रखा।
विधायक संदीप सौरभ इसको लेकर काफी एक्टिव रहे। स्कीम वर्करों में 90 हजार आशा कार्यकर्ताओं, 5 हजार ममता कार्यकर्ताओं, ढ़ाई लाख आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं और तीन लाख विद्यालय रसोईयों की लड़ाई माले की महिला संगठन एपवा ने लड़ी। सरोज चौबे, मीना तिवारी, शशि यादव जैसे एपवा नेत्रियों ने इसमें बड़ा योगदान दिया। माले ने शशि यादव को बिहार विधान परिषद में एमएलसी भी बनवाया।
महागठबंधन में माले का परफार्मेंस कांग्रेस से काफी बेहतर
विधानसभा चुनाव 2020 में भी माले ने बेहतर परफॉर्मेंस दिखाया था। 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 12 पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 19 सीट पर जीत हासिल की थी। इस बार माले तीन सीट पर लोकसभा चुनाव लड़कर दो पर जीती, जबकि कांग्रेस 9 सीट पर लड़कर तीन पर जीती। माले की बड़ी भूमिका पाटलिपुत्र सीट पर लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती को जिताने में रही। मीसा दो बार चुनाव हार चुकी थीं।
राज्य सचिव कुणाल कहते हैं कि माले लोकतंत्र की लड़ाई, गरीबों की लड़ाई लड़ने वाला मजबूत राजनीतिक संगठन है। हमारी पार्टी सिद्धांत पर चलती है। माले ने अपने आंदोलनों के जरिए अपनी छवि जनता के बीच गढ़ी। जनता ने माले को उसकी ईमानदारी का पुरस्कार लोकसभा चुनाव में दिया।
कम संसाधनों में भी चुनाव जीता जा सकता है
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी कहते हैं कि दो सीटों पर माले की जीत चौंकाने वाली है। ऐसे समय में जब चुनाव महंगे और खर्चीले हो गए हैं। हेलीकॉप्टर के बिना नेता प्रचार के लिए निकलते नहीं हैं। माले ने जीप, साइकिल और बाइक के सहारे प्रचार करके अपने दो उम्मीदवारों को जीताने में कामयाब रही। इससे साबित होता है कि उम्मीदवार अच्छा हो और ईमानदारी से मेहनत की जाए तो चुनाव जीता जा सकता है।
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