हाथ फैलाया, सिर झुकाया, शर्मिंदगी उठाई.. शहबाज शरीफ का बड़ा कुबूलनामा, खुद बताया- भीख मांगना PAK की मजबूरी

'दोस्त मुल्कों से मांगना पड़ा कर्ज' शहबाज शरीफ ने भावुक होते हुए कहा, 'मैं आपको कैसे बताऊं कि हमने किन-किन दोस्त मुल्कों के दर पर जाकर कर्ज की दरखास्तें दीं. उन मुल्कों ने हमें मायूस तो नहीं किया, लेकिन जो कर्ज लेने जाता है, उसका सिर हमेशा झुका रहता है.' 'कर्ज मांगने पर इज्जत से समझौता करना पड़ता है' शहबाज ने स्पष्ट शब्दों में माना कि जब कोई देश आर्थिक मदद मांगता है, तो उसे अपनी 'इज्जत-ए-नफ्स' (आत्मसम्मान) के साथ समझौता करना पड़ता है और कर्ज देने वालों की ऐसी शर्तें (Obligations) माननी पड़ती हैं, जिनका बोझ उठाना नामुमकिन होता है. यह भी पढ़ें- मुनीर ने ट्रंप को दिखाया ठेंगा! ईरान पर हमले को लेकर अमेरिका को ही दे डाली नसीहत गौरतलब है कि शहबाज की यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान के आर्थिक हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और पारंपरिक सहयोगी देश भी अब केवल मदद नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और नवाचार आधारित साझेदारी की उम्मीद कर रहे हैं. पहले भी कर चुके ऐसी बातें शरीफ पहले भी कह चुके हैं कि वे दुनिया में भीख का कटोरा लेकर घूमना नहीं चाहते, लेकिन इस बार उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि पाकिस्तान को जिस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, वह बेहद शर्मनाक और असहज करने वाली है. कर्ज तले दबा पाकिस्तान पाकिस्तान न केवल IMF और विश्व बैंक का कर्जदार है, बल्कि वह चीन और सऊदी अरब से लिए गए भारी कर्ज के बोझ के तले दबा है. दिसंबर 2025 तक पाकिस्तान का कुल विदेशी ऋण लगभग 52.366 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है.
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पाकिस्तान की तंगी हालात किसी से छुपी नहीं है. दुनिया जानती है कि आतंक को बढ़ावा देने वाला ये देश दूसरे देशों के कर्जे पर कितना निर्भर है. ऐसे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान के टॉप एक्सपोर्टर्स को संबोधित करते हुए स्वीकार किया कि देश की बदहाल आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को ‘दोस्त देशों के सामने भीख मांगनी पड़ी.’ उन्होंने कहा कि वित्तीय संकट इतना गहरा था कि उन्हें बार‑बार विदेशी दौरों पर जाकर कर्ज मांगना पड़ा.

शहबाज शरीफ ने बताया कि IMF कार्यक्रम बचाने और बाहरी कर्जों के अंतर को भरने के लिए वे ‘चुपचाप कई देशों के पास गए’ और ‘झुके सिर’ से मदद की गुहार लगानी पड़ी. उन्होंने यह भी माना कि कर्ज लेने की शर्तें कई बार ‘अनुचित’ होती हैं और ऐसे में पाकिस्तान को अपनी प्रतिष्ठा से समझौता करना पड़ा.

‘दोस्त मुल्कों से मांगना पड़ा कर्ज’

शहबाज शरीफ ने भावुक होते हुए कहा, ‘मैं आपको कैसे बताऊं कि हमने किन-किन दोस्त मुल्कों के दर पर जाकर कर्ज की दरखास्तें दीं. उन मुल्कों ने हमें मायूस तो नहीं किया, लेकिन जो कर्ज लेने जाता है, उसका सिर हमेशा झुका रहता है.’

‘कर्ज मांगने पर इज्जत से समझौता करना पड़ता है’

शहबाज ने स्पष्ट शब्दों में माना कि जब कोई देश आर्थिक मदद मांगता है, तो उसे अपनी ‘इज्जत-ए-नफ्स’ (आत्मसम्मान) के साथ समझौता करना पड़ता है और कर्ज देने वालों की ऐसी शर्तें (Obligations) माननी पड़ती हैं, जिनका बोझ उठाना नामुमकिन होता है.

गौरतलब है कि शहबाज की यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान के आर्थिक हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और पारंपरिक सहयोगी देश भी अब केवल मदद नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और नवाचार आधारित साझेदारी की उम्मीद कर रहे हैं.

पहले भी कर चुके ऐसी बातें

शरीफ पहले भी कह चुके हैं कि वे दुनिया में भीख का कटोरा लेकर घूमना नहीं चाहते, लेकिन इस बार उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि पाकिस्तान को जिस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, वह बेहद शर्मनाक और असहज करने वाली है.

कर्ज तले दबा पाकिस्तान 

पाकिस्तान न केवल IMF और विश्व बैंक का कर्जदार है, बल्कि वह चीन और सऊदी अरब से लिए गए भारी कर्ज के बोझ के तले दबा है. दिसंबर 2025 तक पाकिस्तान का कुल विदेशी ऋण लगभग 52.366 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है.

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