MP में कम वोटिंग से किसे फायदा: 2 चुनाव में मतदान बढ़ा तो भाजपा ने क्लीन स्वीप किया, घटा तो कांग्रेस को 12 स… – Dainik Bhaskar

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लोकसभा चुनाव के पहले चरण में MP की 6 सीटों पर 67 फीसदी वोटिंग हुई। पिछली बार इन सीटों पर औसत 75 फीसदी वोटिंग हुई थी। इस लिहाज से करीब 8 फीसदी कम वोटिंग हुई है। आखिर क्या है इस वोटिंग के मायने ? ये जानने के लिए हमने पिछले आम चुनावों के वोटिंग पर्सेंट के रुझान देखे। एक्सपर्ट से ये समझने की कोशिश की कि वोटिंग बढ़ने या कम होने से किसे फायदा होगा?
सबसे कम 55.19 फीसदी वोटिंग सीधी में हुई, जो 2019 से 14 फीसदी कम है। शहडोल में भी 11 फीसदी कम वोटिंग हुई है। सबसे ज्यादा 79.59 फीसदी वोटिंग छिंदवाड़ा में हुई।
वोटिंग घटने से छिंदवाड़ा को लेकर सस्पेंस बरकरार है। वजह ये है कि यहां 2019 के मुकाबले लगभग 2.8 फीसदी वोटिंग कम हुई है। 2019 में यहां 82.39% वोटिंग हुई थी।
समझिए एक-एक सीट का समीकरण…
सबसे पहले छिंदवाड़ा की ही बात
छिंदवाड़ा में 79 फीसदी वोटिंग ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए सस्पेंस बढ़ा दिया है। इससे पहले का ट्रेंड बताता है कि छिंदवाड़ा में जब-जब मतदान बढ़ा है, भाजपा के वोट बढ़े हैं। इस बार वोटिंग 2.8 फीसदी कम हुई है।
पिछले 3 चुनाव के वोटिंग ट्रेंड देखें तो छिंदवाड़ा में 2009 में 71.86 फीसदी वोटिंग हुई थी, लेकिन जीत यहां कांग्रेस को ही मिली। इसके बाद 2014 और 2019 के आम चुनाव में जैसे-जैसे वोटिंग पर्सेंट बढ़ा, कांग्रेस की जीत का अंतर कम होता गया। 2014 में कांग्रेस के कमलनाथ 1 लाख 16 हजार वोटों के अंतर से जीते थे। वहीं, 2019 में कांग्रेस के नकुलनाथ ने महज 37 हजार वोट के अंतर से जीत हासिल की।
छिंदवाड़ा को लेकर राजनीतिक जानकार भी असमंजस में हैं। वे कहते हैं कि छिंदवाड़ा में इस बार जिस तरह से चुनाव हुआ है, उसके परिणाम सिर्फ वोटिंग के आधार पर समझना मुश्किल है। वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश जैन कहते हैं कि पहली बार ऐसा हुआ है, जब छिंदवाड़ा का चुनाव नेशनल इवेंट की तरह नजर आया।
वोटिंग ट्रेंड में कमलनाथ के प्रति सहानुभूति नजर नहीं आ रही है। 2019 में भी यहां जीत-हार का अंतर 37 हजार का रह गया था। वरिष्ठ पत्रकार राकेश प्रजापति कहते हैं कि 2004 के बाद से वोटिंग लगातार बढ़ती रही है, लेकिन इस बार करीब 2.5 फीसदी वोटिंग कम हुई है। छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव, पांढुर्णा और अमरवाड़ा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में कांग्रेस को फायदा होता दिख रहा है।
राजनीति के कुछ जानकारों का कहना है कि चुनाव की घोषणा से लेकर वोटिंग के दिन तक छिंदवाड़ा का राजनीतिक तापमान हर दिन बदलता रहा है। वोटिंग डे पर महापौर विक्रम अहाके का कमलनाथ खेमे में शामिल होने का कांग्रेस के लिए पॉजिटिव असर रहा है।
हालांकि, यहां के लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों पर जिस तरह से राजनीति हुई है, उसने यहां लोगों का मानस बार-बार बदला है। आखिरी तक ये कहना मुश्किल है कि चुनाव किसके लिए फायदेमंद होगा।
वजह ये भी है कि बाकी सीटों पर कांग्रेस का संगठन उतना मजबूत नहीं है, जितना कांग्रेस में है। यहां कमलनाथ का इमोशनल कनेक्ट भी कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होता रहा है।
छिंदवाड़ा को समझने के लिए विधानसभावार वोटिंग का ट्रेंड भी समझिए
छिंदवाड़ा की सभी 7 विधानसभा सीटें कांग्रेस के कब्जे में हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले यहां परिस्थितियां बदल गई हैं। 2019 के चुनाव में सबसे ज्यादा 85 फीसदी वोटिंग अमरवाड़ा में हुई थी। यहीं से नकुलनाथ को सबसे ज्यादा 18 हजार वोट की लीड मिली थी, लेकिन यहां से कांग्रेस विधायक कमलेश शाह ने अब BJP जॉइन कर ली है। छिंदवाड़ा शहर से नाथ के भरोसेमंद दीपक सक्सेना ने भी भाजपा जॉइन कर ली है।
मंडला: वोटिंग बढ़ने का फायदा BJP को हुआ, लेकिन इस बार वोट घटे
मंडला में वोटिंग 2019 के मुकाबले कम हुई है। यहां 5 फीसदी कम वोटिंग है। वरिष्ठ पत्रकार सुधीर उपाध्याय कहते हैं कि मंडला में इस बार लोगों में चुनाव के प्रति कम उत्साह था। ऐसा पुराने प्रत्याशी होने की वजह से नजर आया। परिणाम पर वे कहते हैं कि उत्साह कम होने का असर दिखेगा। इस बार यहां हार जीत का मार्जिन भी काफी कम होगा।
बालाघाट: बसपा ने कांग्रेस के वोट काटे, फायदा BJP को
बालाघाट में करीब 73 फीसदी मतदान हुआ है। यहां वोटिंग पैटर्न पिछले चुनाव की तरह ही दिखा है। स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि यहां भाजपा का वोट शेयर बरकरार रहेगा। वजह ये भी है कि यहां कांग्रेस का वोट शेयर बसपा के साथ बंट सकता है। इसका सीधा फायदा BJP को हो सकता है। यहां भाजपा उम्मीदवार भारती पारधी का मुकाबला कांग्रेस सम्राट सिंह सरस्वार और बसपा के कंकर मुंजारे से है।
जबलपुर: मुस्लिम बाहुल्य जबलपुर पूर्व में सबसे कम 54% वोटिंग
जबलपुर में बीते 3 चुनावों से वोट फीसदी लगातार बढ़ रहा था, लेकिन इस बार यहां चुनाव आयोग के अपडेट के मुताबिक 9 फीसदी कम वोटिंग दिख रही है। इससे BJP का वोट शेयर कुछ कम होगा, लेकिन BJP के लिए यहां ज्यादा मुश्किल नहीं है। यहां कांग्रेस बहुत मजबूत नजर नहीं आई थी।
यहां आदिवासी बेल्ट सिहोरा में सबसे ज्यादा 65 फीसदी वोटिंग हुई है, जबकि मुस्लिम बाहुल्य जबलपुर पूर्व विधानसभा में सबसे कम 54 फीसदी वोटिंग हुई है। स्थानीय पत्रकारों का भी ये कहना है कि वोटिंग पर्सेंट गिरने की वजह चुनाव की नीरसता थी। इसका असर चुनाव परिणाम पर होगा ऐसा दिखता नहीं है।
शहडोल: 10 फीसदी वोट कम पड़े, लेकिन BJP को बड़ा नुकसान नहीं
शहडोल में करीब 10 फीसदी कम वोट पड़े हैं। इससे कांग्रेस में उत्साह दिख रहा है, लेकिन 2019 में यहां 60 फीसदी वोट भाजपा को मिले थे। यहां का वोटिंग ट्रेंड ये है कि जब-जब वोटिंग बढ़ी है, इसका सीधा फायदा BJP को होता रहा है, इस बार वोटिंग कम हुई है, लेकिन भाजपा के लिए बड़ी चिंता नहीं है। जानकारों का कहना है कि BJP की हिमाद्री सिंह की जीत का मार्जिन यहां कम हो सकता है।
सीधी: 15 फीसदी कम वोटिंग से भाजपा की चिंता बढ़ी
6 लोकसभा सीटों में सबसे कम वोटिंग सीधी संसदीय सीट पर दिख रही है। यहां 54.36 फीसदी वोट पड़े हैं। ये 2019 के मुकाबले 15 फीसदी कम है। यहां वोट पर्सेंट में गिरावट भाजपा के लिए चिंता की बात हो सकती है। यहां कांग्रेस के कमलेश्वर पटेल और BJP के राजेश मिश्रा के बीच मुकाबला था। यहां भाजपा प्रत्याशी से स्थानीय स्तर पर नाराजगी भी चर्चा में थी।
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MP की 6 सीटों पर 67.08% वोटिंग:छिंदवाड़ा में सबसे ज्यादा 79.18% मतदान
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में मध्यप्रदेश की 6 सीटों पर कुल 67.08% मतदान हुआ। निर्वाचन आयोग के मुताबिक, छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा 79.18%, ​​​​​बालाघाट में 73.18%, मंडला में 72.49%, शहडोल में 63.73%, जबलपुर में 60.52% और सीधी में सबसे कम 55.19% वोट डाले गए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

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