लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा ने अपने लिए 370 और एनडीए के लिए ‘400 पार’ का लक्ष्य रखा है। द इंडियन एक्सप्रेस की कॉलमनिस्ट कूमी कपूर समेत कई राजनीतिक विश्लेषक भाजपा के इन आकड़ों को ‘बड़बोलापन’ मान रहे हैं।
अपने साप्ताहिक कॉलम इनसाइड ट्रैक में कपूर ने लिखा है, “लगातार तीसरी बार आम चुनाव जीतने के लिए संघर्ष कर रही भाजपा सत्ता विरोधी लहर और मतदाताओं की उदासीनता दोनों से जूझ रही है। वह जीत सुनिश्चित करने के लिए मोदी फैक्टर और विपक्ष की गड़बड़ियों पर भरोसा कर रही है।”
मुश्किल सिर्फ इतनी नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि भाजपा को कुछ राज्यों अपने गठबंधन के सहयोगियों की वजह से ही नुकसान हो सकती है। वहीं कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां उसे किसी भी दल से गठबंधन न करने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
पिछले दो चुनाव में भाजपा सबसे ज्यादा मजबूत उत्तर भारत, विशेष रूप से हिंदी भाषी राज्यों में मजबूत हुई है। लेकिन इस बार को उत्तर की ही दो राज्यों में भाजपा को अपने सहयोगी दलों की वजह से नुकसान उठाना पड़ सकता है। बिहार और महाराष्ट्र उत्तर में भाजपा की सबसे कमजोर कड़ी साबित हो सकते हैं।
कपूर मानती हैं कि भाजपा खुद उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन उसके सहयोगी दल उसे निराश कर सकते हैं। वह बिहार का उदाहरण देते हुए बताती हैं कि नीतीश कुमार की जेडीयू को 16 सीटें दी गई हैं। लेकिन इसकी बहुत कम संभावना है कि जदयू अच्छा प्रदर्शन कर पाएगी। वह इसका कारण नीतीश के घटते कद और उनके जाति-आधारित वोट के सिकुड़ने को मानती हैं।
कपूर इनसाइड जानकारी देते हुए लिखती हैं, “जदयू के अधिकांश उम्मीदवार सत्ता विरोधी लहर से प्रभावित बुजुर्ग मौजूदा सांसद हैं और भाजपा कार्यकर्ता उनके लिए प्रचार करने में अनिच्छुक हैं।”
कपूर को महाराष्ट्र में शिंदे की सेना और पवार की राकांपा पर संदेह है। वह लिखती हैं, “महाराष्ट्र में भी भाजपा का प्रदर्शन अपने सहयोगी दलों शिंदे की सेना और अजित पवार की राकांपा से बेहतर रहने की संभावना है। भाजपा द्वारा सेना और राकांपा को विभाजित करने और उनके अधिकांश नेताओं को साथ लेने के बाद भी एमवीए ध्वस्त नहीं हुआ है।”
वह आगे लिखती हैं, “क्षेत्रीय दलों को अपने पाले में करने की भाजपा की कोशिशों से महाराष्ट्र में बेचैनी है। 83 साल की उम्र में भी पवार यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं कि उनकी बेटी सुप्रिया उनके गढ़ बारामती को बरकरार रखे, भले ही भतीजे अजीत के पास निर्वाचन क्षेत्र की शक्तिशाली सहकारी समितियों में कई शक्तियां हों।”
एनसीपी (पवार) और शिवसेना (शिंदे) की रस्सा कस्सी भी भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है। पिछले दिनों ऐसे ही तनाव के चक्कर में छगन भुजबल की उम्मीदवारी चली गई, जिससे भाजपा को ओबीसी वोटर्स का नुकसान हो सकता है।
अजित पवार की एनसीपी के नेता छगन भुजबल अब नासिक से चुनाव नहीं लड़ेगें। उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है। दरअसल, नासिक से एनसीपी (पवार) और शिवसेना (शिंदे) में विवाद चल रहा था। दोनों दलों की दावेदारी की रस्सा कस्सी में छगन भुजबल की उम्मीदवारी चली गई और अब नासिक से महायुति नया प्रत्याशी उतार सकती है।
अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषद के सदस्यों का दावा है कि महायुति गठबंधन को महाराष्ट्र में ओबीसी वोटर्स का नुकसान हो सकता है। ओबीसी समुदाय के सदस्य 45% से अधिक मतदाता हैं और कोंकण, उत्तरी महाराष्ट्र, विदर्भ और मराठवाड़ा के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में फैले हुए हैं।
पंजाब में भाजपा अकेले लोकसभा चुनाव लड़ रही है। पुरानी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (SAD) भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए में शामिल नहीं हुई है। अकाली दल भाजपा के सबसे पुराने सहयोगियों में से एक थी। लेकिन सितंबर 2020 में SAD ने अब निरस्त किए गए कृषि कानूनों को लेकर एनडीए से नाता तोड़ लिया था।
2019 के लोकसभा चुनाव में, SAD और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन वह परिणाम हासिल करने में असमर्थ रहे, जिसकी चाह थी। उत्तर और मध्य भारत में भाजपा समर्थक लहर को मात देते हुए कांग्रेस ने आठ सीटें हासिल कीं। बाकी पांच सीटें बीजेपी (2), SAD (2) और आम आदमी पार्टी (1) ने जीतीं थी। हालांकि, पंजाब में एनडीए की कमजोर हालत के लिए भाजपा कम और अकाली दल ज्यादा जिम्मेदारी थी क्योंकि गठबंधन के तहत भाजपा को तीन और अकाली को 10 सीटें मिली थीं।
भाजपा और अकाली दल के गठबंधन न होने से पंजाब में मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया है। हालांकि, पंजाब में बीजेपी और अकाली दल के हमलों की लाइन लगभग एक जैसी है। भाजपा ने आप और मुख्य विपक्षी कांग्रेस पर पंजाब में “अनौपचारिक” गठबंधन में होने का आरोप लगाया है।
पंजाब में आप, भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा सकती है, यह विस्तार से जानने के लिए फोटो पर क्लिक करें:
